Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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नागपंचमी

इनकी मृत आत्माओं को आओ फिर से जिलाएँ हम
आज नागपंचमी है यारों इनको दूध पिलाएँ हम

तोप, कोयला या मिट्टी हो, सब कुछ पच जाता इनको
भर जाये इनका मन आखिर, ऐसा क्या खिलाएं हम।

डरते नहीं ये ईश्वर से भी ऐसा मुझको लगता है
एक बार चलो तो आज, इन्हें इनसे ही मिलाएं हम।

फ़र्ज़ भुला बैठे हैं जो अब, सत्ता के गलियारों में
इस कुर्सी के असली मालिक इनको याद दिलाएं हम।

बहुत हो गया अब दुःख सहना, आस्तीन के लोगों से
इन लोगों के बिलों में घुस कर इनको आज जलाएं हम।

————–विकास पुरोहित “पूरवे”

ईमानदारी का दूसरा पहलू

राज्य में नई नई ईमानदार सरकार आई है, हर कोई खुश है कि चलो अब तो भ्रष्टाचार ख़त्म होगा, अब कोई भी रिश्वत नहीं लेगा, अब हमारा काम सरकारी व्यवस्था द्वारा पूरी ईमानदारी से किया जायेगा| खैर ये तो लोगों की सोच है और इसी सोच ने ये सरकार बनाई है मगर एक बात ये भी है कि जब हम किसी बात का समर्थन करते हैं तो हमें सिर्फ एक ही पक्ष दिखाई देता है क्योंकि दूसरा पक्ष हम ना तो देखना चाहते है और ना ही कोई दिखा दे तो उस पर यकीन कर सकते हैं|

अब आप सोचेंगे कि ईमानदारी में भी खोट भला कोई कैसे निकाल सकता है तो मैं आपको बता दूँ कि इस तस्वीर का एक और पहलू भी है और वो ये कि बदलाव तभी संभव है जब हम खुद को बदल सकें| अब ज्यादा दार्शनिक ना होते हुए किस्सा शुरू करता हूँ, हुआ ये कि पड़ोस में रहने वाले कलुआ चाचा ऑटो रिक्शा चला कर अपना परिवार चला रहे हैं पिछले 20 सालों से, चाहे किसी की भी सरकार रही हो उन्होंने कभी ना तो शिकायत की और ना ही तारीफ़, जब भी उनसे सरकार के बारे में पूछा जाता तो बस एक ही बात कहते कि बेटा सब अपनी अपनी किस्मत का खा रहे हैं, मेहनत कर के दो वक्त की रोटी कमाता हूँ, सरकार भला क्या करेगी मेरा, मुझे खुद ही मेरा परिवार चलाना है|

इस बार भी जब नई सरकार बनी तो कलुआ चाचा ने वही पुराना जवाब दिया, लेकिन थोड़े ही दिन बाद अचानक मुझे मिले तो जम कर सरकार को कोसने लगे, कहने लगे ये भी कोई सरकार है, गरीबों का बिलकुल भी नहीं सोचती, ऐसी ईमानदारी भी भला क्या काम की जो हमारे पेट पर लात मार दे, एकाएक तो मुझे भी समझ नहीं आया कि आखिर इस सरकार ने ऐसा कौनसा फैसला ले लिया जो गरीबों के खिलाफ है तो मैंने उन्हें पूरी बात बताने को कहा, चाचा कहने लगे बेटा हुआ ये कि इतने वक्त तक मैं रिक्शा चला कर अपना घर चलाता रहा कभी भी तकलीफ नहीं आई, एक साथ 7 लोगों तक को बिठाया है मैंने अपने रिक्शा में वो भी बिना किसी की परवाह किये, स्कूल के बच्चों को भी आगे पीछे मिला कर 15 बिठा लेता था, बड़े आराम से काम चल रहा था, कभी कभार पुलिस वालों ने पकड़ भी लिया तो 100-50 देकर काम निकाल लिया पर अपनी रोजी पर फर्क नहीं पड़ा, पर जब से ये ईमानदारी का ढोल पीटने वाली सरकार आई है तब से पुलिस वाला है कि मानता ही नहीं, मैंने उसे इतना समझाया कि 100 की जगह 200 ले ले मगर जाने दे मगर कहता है हमें रिश्वत लेकर मरना नहीं है, चुप चाप अपना चालान कटवाओ, अब बेटा तू ही बता रोज रोज चालान कटवाऊंगा तो घर का खर्चा कैसे चलेगा, ऐसी ईमानदारी भी भला किस काम की|

चाचा तो अपनी बात कह कर निकल लिए मगर मैं सोचता रहा कि क्या ईमानदारी के भी अपने नुकसान होते हैं|

इस अधूरी सी चाह पर

सब जानते, समझते हुए भी
इन आँखों ने बरसते हुए भी
खुद को पत्थर का कर के
एक शीशे सा खुद को बिखरते
देखा है अक्सर तुझको
बेबस सा पाकर खुद को

हर बार तेरे आंसू
तुझसे ज्यादा मुझे रुलाते हैं
हां ये सच है कि वो लम्हें
मुझे भी फिर से बुलाते हैं
मगर ये भी सच है उतना
कि ये दौर तो आना था
रास्ते की शुरुआत से ही
मालूम ये ही ठिकाना था

अब जरुरी है मेरा बदलना
थोडा इस आग में जलना
जानता हूँ कि तकलीफ होगी
पर यही हालत अब ठीक होगी
वक्त लगेगा सब सुधरने में
तुझे इस सब से उबरने में

खैर अलविदा कहना ही होगा
ये गम अब सहना ही होगा
हो सके तो खुद को समझा लेना
इस इश्क की लौ को बुझा लेना
फिर मिलेंगे किसी जन्म में
किसी अनजान सी राह पर
लेता हूँ विदा तुमसे अब मैं
दिल की इस अधूरी सी चाह पर

एक महान इंसान

Morning Experience

आज सुबह सुबह एक महान इंसान से बात करने का मौका मिला, नाम से अगर गूगल पर सर्च करेंगे तो शायद ही मिल पाएं मगर उनकी बातें सुन कर जरूर लगा कि बहुत महान हैं। और उन महान इंसान ने मुझ जैसे तुच्छ इंसान के आगे अपनी महानता का बखान केवल इसलिए किया ताकि मुझे ये अहसास हो सके कि वो मुझसे बात कर के कितना बड़ा अहसान कर रहे हैं मुझ पर।

अच्छा तो बात को जरा लम्बा ना खींचते हुए सीधा सीधा वो सब कहता हूँ जो वो कहना चाहते थे अपने दिल में:-
” तुम्हे जरा भी अंदाजा है कि तुम किससे बात कर रहे हो, तुम शायद मुझे नहीं जानते इसीलिए मेरी आलोचना कर रहे हो, अरे तुम्हे क्या पता है, मैंने बचपन से लेकर आज तक हज़ारों किताबें पढ़ी हैं वो भी ऐसे ऐसे लेखकों की जिनके नाम तक तुमको नहीं पता होंगे, हज़ारों किलोमीटर का सफर किया है, इस दुनिया के जितने भी बड़े बड़े समझदार लोग है और बुद्धिजीवी हैं वो सब मेरी जान पहचान के हैं, मैंने खूब समाजसेवा के काम किये हैं, मेरे पास बहुत पैसा है मैं चाहता तो ऐशो आराम की जिंदगी बिता सकता था मगर मैं घूमता रहा और गरीबो के बीच में जा जाकर फोटो खिंचवाता रहा, आप मेरी आईडी देखोगे तो उसका सबूत मिल जायेगा, ये मेरा बड्डपन ही तो है जो मैं तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में शामिल हूँ, और क्या बात करते हो यार कि नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल देश का भला करेंगे, देश का भला सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस कर सकती है और आज तक करती भी आई है, तभी तो याद करो एक वो वक्त था जब तुम घर के बाहर नाली में निपटने जाते थे और आज खुद के घर में संडास में बैठे बैठे फेसबुक चला रहे हो, अगर कांग्रेस ना होती तो तुम्हारा बिलकुल भी भला नहीं होता, हां हां जानता हूँ कि लहर चल रही है, मगर ये सब लोग मूर्ख हैं, आने वाले वक्त में इन्हे इनकी गलती का अहसास होगा और पता चलेगा कि मैं कितना महान हूँ, खैर तुमने किया ही क्या है, अपनी जिंदगी ख़राब ही तो की है अभी तक, ना मेरी तरह हज़ारों किताबें पढ़ी ना कोई समाजसेवा का काम किया, अगर किया है तो डालो उसकी फोटो फेसबुक पर, आखिर मुझे भी तो पता चले। ” और देखो मैं कितना विनम्र हूँ जो इतना महान होकर भी तुमसे बात कर रहा हूँ।

तारीफ के लायक

Determined

मन बहुत भारी हो रहा है, वैसे किसी को लग सकता है कि रात के 1 बजे मन भारी हो रहा है तो जरूर कोई प्यार व्यार का चक्कर होगा मगर ऐसा कुछ नहीं, नींद तो आ रही है मगर सो गया तो मन की बात मन में ही रह जाएगी, लिखने के सिवा कोई और रास्ता भी नहीं खुद का दिल हल्का करने का। बस ऐसा लग रहा है जैसे कुछ किया ही नहीं जिंदगी में अभी तक, कुछ भी ऐसा जिस पर गर्व कर सकूँ, हां वैसे लिखते लिखते याद आया कि कुछ किया तो है जिससे दिल को थोड़ा सुकून मिल रहा है मगर पूरी जिंदगी के लिए उतना काफी नहीं, और ना ही ऐसा जिसे बता कर उसे करने की ख़ुशी को ख़त्म कर दूँ, बस ऐसा कुछ करना है जिससे दिल को भी ख़ुशी मिले और लोग भी प्रेरित हों। कोई ऐसा काम जिसकी लोग तारीफ करें तो लगे जैसे सच्ची तारीफ है, आज किसी दोस्त ने मजाक में कहा कि मैं तारीफ के लायक नहीं, मगर सच कहूँ तो इस एक बात ने पूरी जिंदगी को एक पल में आँखों के सामने लेकर खड़ा कर दिया, सच ही तो कहा उसने कि मैंने ऐसा क्या किया है जिसकी तारीफ की जा सके, बस कुछ एक परीक्षाएं पास की है जो कोई भी पढ़ कर पास कर सकता है, शक्ल सूरत मैंने नहीं बनाई तो उसकी तारीफ मेरी तारीफ नहीं हुई, फिर क्या किया, कुछ भी तो नहीं जिसकी तारीफ की जा सके। बड़ा गर्व करता हूँ खुद ही खुद को लेखक कह कर, मगर क्या इस कलम ने किसी का भला किया है अभी तक, नहीं ना, की है तो सदा खुद की तारीफ या दूसरों की बुराई या अधिक से अधिक समाज में जो फैली बुराई है उसे दिखने की कोशिश की है कभी कभार, मगर इतना काफी नहीं, ऐसा नहीं की तारीफ की जा सके।

अभी तक बस साधन की तलाश में लगा हूँ, ताकि जो साध्य हैं उन्हें साध सकूँ, मगर इतनी देर हो रही है कि सब्र नहीं किया जा रहा, हिम्मत धीरे धीरे छूट रही है, बस उम्मीद के दम पर कोशिशों में लगा हूँ, लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट हैं बस रास्ता ही है जो बार बार अलग अलग मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर देता है। इतना यकीं है कि एक दिन वो जरूर आएगा जब अपने लक्ष्य पूरे कर पाउँगा और वो सब कुछ हासिल कर पाउँगा जो सिर्फ अभी तक मन में है, सोचा बहुत बड़ा है और इसीलिए साधन जुटाने में वक्त लग रहा है और वो भी तब जब परिस्थितियां कई बार प्रतिकूल हो जाती हैं। ना तो लेखक बनना लक्ष्य है और ना ही नाम कामना, लक्ष्य तभी बताऊंगा जब उसे हासिल करने की तरफ थोड़ा और आगे बढ़ जाऊंगा।

आज खुद के साथ उस दोस्त को भी दिल से कहना चाहूंगा कि तुम्हारा बहुत शुक्रिया और हां मैं तुम्हे यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हे एक दिन मेरी तारीफ करने लायक जरूर कुछ कर के दिखाऊंगा और शायद तुम्हे ये गर्व करने का मौका भी दे सकूँ कि मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।

मीडिया: वकील या जज?

Media: Judge or Lawyer
हाँ ये सही है कि मीडिया का काम जनता की नब्ज को पहचानते हुए उनसे जुडी खबरें दिखाना है, मगर यदि कोई उंगली उठाता है मीडिया पर तो इसे सभी स्वीकार करेंगे कि मीडिया को भी आत्ममंथन की जरुरत है, कहीं  कहीं मीडिया अब तथ्य रखने के बजाय फैसले सुनाने लगा है, जनता का वकील होने की बजाय जज होने लगा है तभी उस पर उंगलियां उठ रहीं हैं।
खैर मेरा मुद्दा तो बस इतना है कि जिस मीडिया को देश को एकजुट करने और जातिबंधनों से मुक्त करने की दिशा में कुछ काम करना चाहिए था वही अब उसको बढ़ाने में लगा है, रोज के नए नए सर्वे देखता हूँ जिसमे हर प्रदेश के लोगों को जाति में, धर्म में बाँट कर बताया जाता है, जब ये सुनता हूँ कि इस जगह इतने ब्राह्मण वोट हैं, इतने दलित वोट हैं तो लगता है जैसे लोगों का अपना कोई महत्व नहीं, जैसे सब सिर्फ अपनी जाति देखकर वोट करते हैं, हां ये सही है कि ऐसा होता है काफी जगह, मगर जिस तरह से साक्षरता का स्तर बढ़ा है, लोगों तक टीवी की पहुँच बढ़ी है, ऐसे माहौल में कम से कम एक कोशिश तो की जा ही सकती है।  ऐसा किया जा सकता था कि आप किसी स्थान विशेष पर जातिगत समीकरणों की बजाय वहां के उम्मीदवारों का पूरा विवरण देते, उनकी आपस में तुलना करते ताकि लोग अपने विवेक से सही या गलत का फैसला कर के वोट कर सकते।
दूसरा एक और चीज़ जो अजीब लगती है वो ये कि कोई भी नेता जब किसी धर्मगुरु से मिलता है तो स्वाभाविक है उसे सभी लोगों से मिलना पड़ेगा ताकि हर किसी तक अपनी बात पहुंचा सके, इसमें कुछ भी गलत नहीं मगर ये बात तभी गलत हो जाती है जब कोई किसी मुस्लिम मौलानाओं से मिलता है, अरे भाई, जब वही नेता किसी हिन्दू धर्मगुरु से मिलता है तब तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होती तब तो कुछ नहीं कहा जाता मगर मुस्लिम धर्म गुरुओं से मिलते ही इसे तुष्टिकरण का नाम दे दिया जाता है।
क्या मुस्लिम इस देश के नागरिक नहीं हैं, क्या उनके धर्मगुरु के कहने मात्र से ही सारे मुसलमानों के वोट किसी एक को मिल जायेंगे, यकीं मानिये जितने समझदार आप हैंउ तने ही वो भी है, तुम अगर अपने पंडितों की बात मानकर किसी को वोट नहीं देते तो वो भी ऐसा ही करते हैं। इस मामले में मीडिया की जिस तरह से खबरें आती हैं वो साफ़ दिखती है कि उन्होंने इस जहर को बढ़ाने का काम किया है बजाय इसे एक स्वाभाविक क्रिया बताने के।

काश कि जनता से जुड़े मुद्दों पर और उम्मीदवारों के व्यक्तिगत योग्यताओं पर बात होती बजाय सिर्फ एक ही प्रकार की खबरें दिखानेके।

उम्मीदें एक बिंदु

Spreading Hope
जब  उम्मीदें एक बिंदु पर आकर टिक जाती हैं तो ऐसा ही होता है कि निराशा हाथ लगती है, अक्सर ऐसा होता है कि जिस एक चीज़ पर हम निर्भर हो जाएँ वही हमसे छूट जाती है। हम सोचते हैं कि सिर्फ ये हो जाने से सब कुछ आसान हो जायेगा और बस हम अपने हिसाब से जी सकेंगे, और अगले ही पल वो सपना टूट जाता है और इस तरह कि बस उसी ढर्रे पर जीने पर मजबूर होना पड़ता है।
लगता है जैसे सिर्फ मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ होता है, क्यूँ मन की बात मन में ही रह जाती है, क्यूँ जो चाहता हूँ वो कभी होता ही नहीं।
शायद सबको ऐसा लगता है, और यकीं करो एक दिन ऐसा भी आता है जब हमें अहसास होता है कि अगर वैसा ना हुआ होता तो बहुत पीछे रह गये होते, या पीछे ना भी रहते तो भी बस जिंदगी जी रहे होते, वैसे ये यकीन करने के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं कि “भगवान् जो करता है अच्छे के लिए करता है बस उस अच्छे की तलाश हम पर या वक्त पर छोड़ देता है”।
इससे बचने का बस एक ही रास्ता है और वो ये कि उम्मीदों को एक बिंदु पर केंद्रित करने की बजाय उसे एक वृक्ष की तरह या फिर हवा की तरह फैला दिया जाए और जिंदगी जी जाए इस तरह कि जैसे उम्मीदें पूरी होतीं रहेंगी रफ्ता रफ्ता, हमें भी कोई जल्दी नहीं, हो गई तो ठीक वरना ख़ुशी से जी तो रहे ही हैं।
वो कहानी तो सुनी होगी ना जिसमे एक राक्षस की जान एक गुड़िया में बसी होती है और जिस दिन वो गुड़िया टूटी उस दिन  उसकी जान भी चली गई, हम क्यूँ वो राक्षस बने, क्यूँ हमारी जान किसी एक चीज़ में बसी हो, हमारी जान तो बसी हो हर एक छोटी सी ख़ुशी में, ऐसे छोटे छोटे लम्हो में जो एक गया तो दूसरा आएगा। कोई और क्यूँ निर्धारित करे कि हमें कब खुश होना है और कब दुखी, ये हक़ सिर्फ हमें है और हमें ये हक़ है कि हम अपनी ख़ुशी बिखरा कर रखें उन सब लोगों कि तरह भी जिनके पास दुनिया की तमाम सुख सुविधाएँ तो नहीं होती मगर वो छोटी छोटी बातों पर अक्सर मुस्कुराते हुए देखे जा सकते हैं, गरीबी तब कही जाती है जब हम खुश होना चाह कर भी खुश ना हो पाएं।
उम्मीद के एक बड़े से बिंदु को हजारों पलों के टुकड़ों में बिखरने के इन्तजार में शुभ रात्रि। 

धर्म की खातिर

Poem
किसी की जान लेकर बेफिक्री से कैसे जीते हैं
ये कौन लोग हैं जो इंसानियत का लहू पीते हैं
माफ़ी मांग लेने से नहीं जाते दर्द लौट कर कभी
ये बात वही समझेंगे जिन पर वो पल कभी बीते हैं
जायज़ ठहराते हैं अपनी बात को धर्म की खातिर
कोई पूछे तो ज़रा इस धर्म को ये कहाँ से सीखे हैं
आँखे खोलोगे तो दिख जायेगा हर जर्रे में वो ऐ दोस्त
जिसे आसमान में बिठा रखा है वो असल में नीचे है
जीतेगी आखिर में ये अमन की फसलें ही एक दिन
सूख जायेंगे वो पौधे जो तुमने नफरतों से सींचे हैं

 

स्वतंत्रता सेनानी

a Freedom Fighter's story
आज ऑफिस में एक शख्स आये, उम्र 115 वर्ष होने में 3 महीने कम, मगर बोलने की और काम करने की ऊर्जा देख कर कोई युवा भी शरमा जाए। उनके बारे में थोडा जाना तो आश्चर्य का ठिकाना ना रहा, कितनी सच्चाई थी वो तो नहीं कह सकता मगर उनके कुर्ते के जेब पर टंगे हुए पंद्रह से बीस कार्ड जिन पर उनका किसी में अशोक गहलोत के साथ तो किसी में कोई और के साथ तस्वीर में नाम और अख़बारों की कटिंग भी थी साथ में। पता चला की स्वतंत्रता सेनानी रह चुके हैं, पैंतालिस वर्ष की उम्र तक भारतीय वायु सेना में पायलट थे, जन्म काशी में और पालन पोषण हैदराबाद में हुआ, फिर परिवार के साथ गुजरात आ गये, उनके माता पिता की अंग्रेजों ने हत्या करवा दी और वो स्वतंत्रता संग्राम में जुड़ गये, महात्मा गाँधी की शादी में उनके साथ राजकोट जाकर 2 महीने साथ भी रहे, साबरमती के किनारे 6 गोलियां खाई शरीर पर फिर सौराष्ट्र में भी 1 गोली और उसके बाद लाल किले में 5 गोलिया खाने के बाद भी जीवित बच गये तब खुद ने ही अपनी अंतरात्मा की आवाज़ से लिख दिया की मेरी उम्र 147 वर्ष होगी। आज उनकी पूरी पेंशन सरकारी खाते में जमा होती है जिससे उनके निर्देशानुसार धार्मिक और सामाजिक कार्य किये जाते हैं, उनका सारा खर्च सरकार वहन करती है और स्वयं गरीब बच्चों को पढ़ाने, गौशाला चलाने और गरीबो की खातिर एक संस्था चलाते हैं और खुद ही जगह जगह घूम कर इस कार्य के लिए जो भी राशि की आवश्यकता होती है, इक्कठी करते हैं।
उनके नाम और फोटो को बताने के लिए उनकी अनुमति नहीं मिली इसलिए नहीं बता सकता आपको, मगर सच में एक जबर्दस्त अनुभव था, ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके आगे हम तो कुछ भी नहीं, उनका निवास जयपुर में है आजकल, फ़ोन नंबर ले लिए हैं, कभी जाकर मिलना हुआ तब और भी बहुत कुछ जानने की इच्छा है। भगवान उन्हें सदा स्वस्थ रखे। जय हिन्द। वन्दे मातरम।

धर्म का अपमान

Article by Vikas Purohit
हालाँकि धर्म और राजनीती पर ना तो कोई बहस की जा सकती है और ना ही कभी एकमत हुआ जा सकता है मगर फिर भी अपनी बात आपके बीच रखना चाहूँगा, आप इसे ठुकरा देने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं। कई दिनों से देख रहा हूँ कि कोई भी घटना होती है तो कुछ लोग उसे हिन्दू धर्म से जोड़ देते हैं और साथ ही अपनी भावनाएं आहत कर के उसे पूरे धर्म के अपमान के तौर पर दर्शाने लगते हैं। मुझे उस वक्त लगता है जैसे या तो उनकी धार्मिक भावनाएं इतनी कमज़ोर हो गई हैं कि उन्हें कोई भी आहत कर सकता है या फिर किसी और संप्रदाय द्वारा अपनी भावनाएं आहत करने की यह एक नक़ल मात्र है। उनका तर्क होता है कि जब इस्लाम पर कोई पिक्चर बनती है और उसके विरोध में यहाँ हंगामा होता है, यहाँ सार्वजनिक सम्पति को नुकसान पहुँचाया जाता है तो हम भी क्यूँ ना ऐसा ही करें ताकि अगली बार कोई हमारे धर्म का अपमान करने से पहले सौ बार सोचे। मगर मेरा मानना है कि जो गलत है उसकी नक़ल कर के अपने आप को सही साबित नहीं किया जा सकता और जिस धर्म का अपमान हो जाये उस धर्म को ही मिटा देना चाहिए,व्यक्ति का अपमान हो सकता है मगर धर्म का नहीं, आप स्वतंत्र है किसी भी धर्म को मानने के लिए, कोई धर्म आपको बाध्य नहीं करता मानने के लिए, हाँ उसको मानने वाले जरुर कर सकते हैं फिर चाहे वो खुद उसकी हर अच्छी बात को मानते हो या नहीं। रामलीला नाम रखने से और उसके अन्दर हिंसा या आपत्तिजनक दिखाए जाने से तो आपकी भावनाएं आहत होती हैं मगर कोई राम नाम का व्यक्ति खुद राम नाम का मजाक उडाये तब आपकी भावनाएं आराम करती हैं, या फिर तो ऐसा कीजिये ना कि जो भी जेलों में बंद अपराधी हैं उनमे जिनका भी नाम भगवान् के नाम पर है, उसे बदल दीजिये, अगर अपने बेटे का नाम राम रख रहे हैं तो उसे राम जैसे संस्कार दीजिये, और सिर्फ इस नाम की पिक्चर का ही क्यूँ, हर आपत्तिजनक चीज़ का बहिष्कार कीजिये ना। दिखावटी विरोध बंद करो, आपको सिर्फ इसलिए आपत्ति हैं क्यूंकि उसका नाम हमारे धर्म से जुड़े शब्द पर रखा गया हैं, और अगर नाम बदल दिया जाए तब उसमे कुछ भी आपत्ति नहीं फिर आप आराम से उस पिक्चर को देखने जा सकते हो, अजीब सोच है आपकी। वैसे मुझे लगता है कि शब्दों पर, व्यक्तियों पर और प्रतीकों पर अपनी आस्थाएं टिका देने की बजाय हम हर बात में निहित विचार से जुड़ाव रखें, पूजा हो तो उस विचार की ना कि उससे जुड़े प्रतीक की। क्यूंकि जिस दिन प्रतीक खंडित होगा, हमारी आस्था भी खंडित हो जाएगी मगर विचार सदा जीवित रहता है और उसी तरह हमारी आस्था भी सदा जीवित रहेगी, फिर ना तो कोई अपमान ना किसी की भावनाएं आहत। करने दो जो करते हैं, आपको आपत्ति है कि क्यूँ वो अभिनेत्री का नाम राधा रख कर उससे अश्लील नृत्य कराते है जबकि कभी फातिमा नहीं रखते, आपको भी पता है कि वो ऐसा क्यूँ करते हैं, सिर्फ और सिर्फ डर की वजह से, तो आप क्या चाहते हैं कि वो आप से भी डरें या उस भगवान् से डरें, क्यूंकि यदि आप चाहते हैं कि वो भगवान् से डरें तो फिर ये फैसला भी भगवान् के हाथ में ही क्यूँ ना छोड़ दिया जाए कि उसकी सजा वो ही निर्धारित करें। भगवान् इतने कमजोर तो नहीं कि कोई भी उनका अपमान कर सके। जब वसुधैव कुटुम्बकम की बात करते हो तब क्यूँ किसी और वर्ग को अलग कर देते हो, जब पूरी सृष्टि को उसी ने बनाया है और वो ही सबका पिता है तो आप कौन होते हैं उसी की बनाई हुई कृतिओ में भेदभाव करने वाले। और यदि आप फिर भी भेदभाव करते हो तो फिर क्या आप खुद उनका अपमान नहीं कर रहे। बात सोचने वाली है, यदि नफरत फैलाने से फुर्सत मिले तो अमन के बारे में भी जरा सोच कर देखना, अच्छा लगता है।

तिरंगे के तीन रंगों का मतलब

Vikas Purohit Poorve
बहुत हुआ बच्चों को बहकाना, झूठे अर्थ समझाना। बचपन से सुनता आ रहा हूँ तिरंगे के तीन रंगों का मतलब:- केसरिया त्याग और बलिदान का प्रतीक, सफ़ेद शांति का प्रतीक और हरा धरती की हरियाली का प्रतीक। मगर आज जाकर इसका सही अर्थ समझ आया है। जब से अंग्रेज आये है (उससे पहले से हो तो भी मुमकिन है) धर्म के नाम पर लोगों को लड़ाया जा रहा है वो भी सिर्फ और सिर्फ राज करने के लिए, वैसे और अधिक साफ़ साफ़ कहूँ तो हिन्दू और मुसलमान को ही लड़ाया जाता है बाकि धर्मो से कोई लेना देना नहीं। और इंसान ने धर्म के नाम पर हर चीज़ का बंटवारा किया फिर चाहे रीती रिवाज़ हो चाहे मान्यताएं। और इसी कड़ी में उन्होंने प्रकृति के रंगों का भी बंटवारा कर दिया, केसरिया या यूँ कहे भगवा हिन्दू ने लिया और हरा मुसलमान ने, इसका कारण मुझे नहीं पता। और तब से कुछ इंसानों द्वारा दोनों के बीच शांति स्थापित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। जब आज़ादी की लड़ाई चल रही थी तब भी अंग्रेजों के साथ साथ सत्ता के लालची लोगों ने सत्ता पाने के लिए इसी चाल को अपनाया क्यूंकि किसी इंसान को धर्म के नाम पर आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है, यदि हम किसी को कहें कि ऐसा किसी वैज्ञानिक ने कहा है तो हो सकता है कि वो उस पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाये मगर यदि ऐसा कह दिया जाए कि ऐसा हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है तो सारे सवालों की गुंजाइश ही ख़त्म हो जाती है। तो बस इसी चीज़ का फायदा उठा कर इन्हें आपस में लड़ाया जा रहा है। बात जब राष्ट्रीय ध्वज बनाने की आई तो इसी बात को ध्यान में रख कर तिरंगा बनाया गया ताकि समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व हो सके यानी की सबसे ऊपर भगवा हिन्दुओं का प्रतीक, सबसे नीचे हरा मुसलमानों का प्रतीक और बीच में सफ़ेद उनमे आपस में शांति बनाये रखने का प्रतीक। अब इस अर्थ में कितनी सच्चाई है ये तो मैं भी नहीं जानता मगर मुझे यही सच लगता है, बाकि यदि आप चाहे तो वही बचपन वाला अर्थ मानते हुए खुश रह सकते हैं।

क्यों तलाशते हो तुम

Poem by Vikas Purohit
क्यों तलाशते हो तुम मुझे मेरी हर कविता में 
कि जैसे लिखी हो मैंने सब अपने ही अनुभवों से 
कभी किसी कविता में बेवफा खुद को पाती हो 
और दर्द भरे दिल को मुझसे जोड़ बैठती हो 
कभी मेरी यादों को जोडती हो हमारी गुजरी बातों से 
उस कविता में हंसने वाले दोनों जैसे हम ही हो 
क्यूँ हर कविता में वो लड़की तुम होती हो 
और हर वो तन्हा सा लड़का मैं ही 
नहीं ऐसा कुछ भी नहीं 
ना मैं तन्हा हूँ, ना अकेला और ना ही दुखी 
बल्कि मस्त हूँ अपनी ही मस्ती में  
वो शख्स कोई और है 
उसे किसी और ने धोखा दिया है 
ना तुम हो, ना मैं 
तुम तो मुझमे हर वक्त हो फिर क्यूँ रहूँ मैं दुखी 
बदल डालो हर कविता का मतलब 
और देखो उन दोनों तन्हा लोगों को 
मेरी तरह सड़क किनारे से 
और रहो खुश क्यूंकि मैं हूँ 
अब भी तुम में ही