Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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मनहूसियत के परे

मुझे मनहूस लोगों से सख्त चिढ़ होती है, अब आप कहेंगे कि मनहूस भला कोई कैसा होता है?

मनहूस वो होता है जो खुद तो दुखी रहता ही है साथ ही अपने आस पास और खुद से जुड़े लोगों को भी दुखी करता है, उसे ऐसा लगता है कि उसकी जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं हुआ आज तक और न ही कभी होगा, उसे खुद का पैदा होना भी एक दुर्घटना लगती है और तो और उसे ऐसा तक लगता है कि भगवान् ने दुनिया बना कर बहुत बड़ी गलती की है, क्या जरुरत थी खामखाँ ये दुनिया बनाने की ऐसा कौनसा पहाड़ टूट रहा था।
मुझे हर वक्त शिकायत करने वाले और परिस्थितयों का रोना रोने वाले लोगों को देख कर घिन्न आती है क्योंकि ऐसे ही लोग होते हैं जो सिर्फ समस्या देखते हैं, दोष देते हैं और कमियां निकालते हैं मगर समाधान, इलाज ढूंढने की कभी कोशिश नहीं करते। मैं मानता हूँ कि दुनिया की कोई भी ऐसी समस्या नहीं जिसका समाधान नहीं, कोई ऐसी मंजिल नहीं जिसका रास्ता न हो, जरुरत होती है तो बस सकारात्मक रह कर उस दिशा में प्रयास करने की। ऐसे तो इयरफोन भी रोज उलझ जाता है मगर उसे सुलझा कर ही हम गाने सुन सकते हैं तो जिंदगी भी क्या हुआ जो रोज उलझ जाती है, क्या हुआ जो एक समस्या सुलझते ही दूसरी समस्या आ जाती है, जिंदगी जीने का मजा उसके बाद ही है।
और एक खासियत ऐसे लोगों की ये होती है कि ये भूतकाल से निकलना ही नहीं चाहते, जब भी कुछ समस्या आती है ये बार बार भूतकाल को याद कर के पछताते रहते हैं। इन्हें कौन समझाए कि उसी भूतकाल के चक्कर में ये वर्तमान में दुखी हैं और इस दुःख में अपने भविष्य को भी बिगाड़ रहे हैं। इन्हें समाधान बताना खुद को दुखी करने के बराबर है क्योंकि जब तक कोई खुद अपने दिल से खुश होना नहीं चाहेगा तब तक दुनिया की कोई भी ताकत उसे खुश नहीं कर सकती। अगर कोई दुःख में ही आनंद पाता है तो उसे दुनिया का कोई भी सुख आकर्षित नहीं कर सकता।
आप कहेंगे कि ऐसे लेक्चर झाड़ना बहुत आसान है असल जिंदगी में लड़ना बहुत मुश्किल पर मैं आपको बता दूं कि लगभग हर इंसान की जिंदगी में ऐसा एक वक्त जरूर आता है जब उसे लगता है कि अब आगे कोई रास्ता नहीं, जिंदगी ख़त्म कर देनी चाहिए मगर जो उस दौर को हिम्मत रख कर गुजार देता है वही एक विजेता बन कर उभरता है।
वक्त तो कैसा भी हो गुजर जायेगा मगर आप गुजर गए तो फिर लौट नहीं पाएंगे इसलिए कोशिश कीजिये कि बुरे वक्त को खुश रह कर जल्दी से जल्दी गुजर जाने में मदद कर सकें।

तुम्हारी गलती नहीं थी

Poem by Vikas Purohit
क्यूँ देखते हो हर बात में सिर्फ अपना अक्स
वो दौर बीत चुका है जब तुम ही दुनिया थे
हर बात शुरू होती थी सिर्फ तुमसे
और सारी कोशिशें भी थी
तुम्हे पाने की उम्मीद से ही
हां ये सही है कि कोई गलती नहीं है तुम्हारी
मगर ये भी उतना ही सही
कि बदल चुके हैं अब हालात
दिल तो वही है मगर उसे आदत नहीं
तुम्हे किसी और के साथ देखने की
अकेला रह सकता है, खुश ना सही
मगर मशगूल अपनी धुन में ही
जो कहता हूँ वो मैं नहीं होता
वो शख्स कोई और है
चाहे रहता हो मुझ में ही
उसकी बातों से चाहे तुम्हे लगे 
मगर निशाना होता हूँ मैं ही 
 छोड़ रखा है सब कुछ वक्त के भरोसे
तुम्हे दिया है मौका
ताकि आ सके फिर से हसीं
देखी थी तुम्हारी तस्वीर उस शख्स के साथ
लगा जैसे वक्त लगा रहा है मरहम
चेहरे से थोड़ा खुश लग रही थीं तुम
उसके साथ वो तुम्हारा लिखा “हम”
बस उस दिन के बाद रोक लिया खुद को
रोक लिया फिर से जुड़ने से इस पुल को 
रोक लिया इस नदी में बहने से खुद को
डूबना बेहतर लगा
सूखे किनारे पर पहुंचने से
और तुम्हे लगा कि मैं बदल गया
बदला नहीं बस इतनी सी बात है
तुम्हे गिरता देखने से पहले संभल गया
और हां एक आखिरी बात दोहराऊंगा फिर से
तुम हर बात में बिलकुल सही थीं
मैं कुछ भी लिखूं मगर
तुम्हारी कुछ भी गलती नहीं थी