Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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एक माँ ही

Poetry on father by Vikas Purohit

बहुत कुछ लिखने को

लिखा जाता है माँ पर

कोई तो लिखे पिता पर भी

प्यार जिनका अक्सर

रह जाता है अनकहा

करना पड़ता है बस महसूस

अपनी ख़ुशी में देखनी होती है

उनकी आँखों की चमक

अपनी बेबसी में उनकी व्यथित आँखें

बिना जताये सब कुछ करने की आदत

माँ का आदर करने पर

उसी तरह खुश होते हैं पिता

अपनी सारी तकलीफें,

एक मुस्कान में भूलने की

वो मासूमियत

क्या लिखूं कि वो देखते हैं

मुझे हर पल

अनजान बने रह कर भी

पूछते हैं मेरा दुःख

अकेले में माँ से

समझते हैं चेहरे का हर भाव

बिलकुल माँ की तरह

लगता है जैसे माँ से भी ज्यादा

नाज़ुक है इनका दिल

आखिर पिता भी तो

होते हैं एक माँ ही”

बेहतर है मैं प्यार लिखूं

Poem by Vikas Purohit

ऊंच नीच और ज्ञान की बातें 
बाँट देती है लोगों को 
सबको जोड़े रखने को अब 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

कहाँ का नेता, कहाँ का चमचा 
मिले वोट बस वहीँ पे थम जा 
लड़ जा, भिड़ जा, कट जा, पिट जा 
नेताओं के खातिर मिट जा 
मेरा नेता, तेरा नेता 
कौन है बाप और कौन है बेटा 
इन सब बातों में पड़कर अब 
काहे मैं तकरार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

मरे जो कोई मर जाने दो 
लुटे जो कोई लुट जाने दो 
सब चालू है, सब फ़र्ज़ी हैं 
इन सबकी खुद की मर्ज़ी है 
हमने तो कब से साहबों को 
डाल रखी कितनी अर्ज़ी है 
भूख, गरीबी नहीं है कुछ भी 
और ना भ्रष्टाचार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

वो देखो वो मुन्नी, शीला 
किसका कितना दिल है ढीला 
नाचो गाओ कुछ ना सोचो 
नेताओं का सर ना नोचो 
कांड करे सो कांडा भाई 
घास चरे सो लल्लू 
ये सब तो हैं बड़े लोग 
बस हम ही एक निठल्लू 
न्याय के मंदिर में निर्धन की 
अब तो सदा ही हार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

वो है कमतर, वो है बेहतर 
क्या मिलता है ये सब कह कर 
नेतागीरी का लगा है मेला 
सबके साथ है सबका चेला 
देश बेचकर खा लेंगे पर 
हमको नहीं मिलेगा धेला 
लड़ कर भी जब मिले ना कुछ भी 
क्यों मैं हाहाकार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

मानव कैसे कहूँ तुझे

Poem on Rapists by Vikas Purohit
पशु कहूँ, हैवां कहूँ या कोई लाऊं शब्द नवीन
मानव कैसे कहूँ तुझे, जब मानवता रही नहीं
क्रूर कहूँ, जालिम कहूं, दुष्कर्मी, हृदयहीन
खून तेरा पानी हुआ, जो तू पिघला ही नहीं
 
एक पल भी ना सोचा तूने, तू भी बेटा है, भाई है
जो तूने हैवां होने की अब सारी हदें गिराई हैं
सोचा ना तूने इस तन में, एक दिल भी हरदम रहता है
उम्मीदें रखने वाला तुझसे, एक पिता तेरे घर बसता है
हर ख्वाहिश, दुआ जो तुझे मिली, उन सबकी साख गवाई है
हम मानव हैं, कोई चीज़ नहीं, तूने ये बात भुलाई है
 
बेशर्म कहूँ, पापी कहूँ, तू दया हया विहीन
मानव कैसे कहूँ तुझे,जब मानवता रही नहीं
 
जबसे तेरी ये रूह बिकी, हर कदम पे तू शैतान हुआ
तेरे जैसों के कारण ही, हर पुरुष यहाँ बदनाम हुआ
कैसे दिलवा पाउँगा मैं, अब यकीं यहाँ हर लड़की को
कल सबने देखा है उसको, उस बहन का जो अंजाम हुआ
हर शख्स यहाँ मुजरिम लगता, ये तेरी ही तो कमाई है
इंसानियत शर्मसार करने की कसम तूने खाई है
 
जल्लाद है तू, दुष्ट कहूँ, दानव खर, कुलहीन
मानव कैसे कहूँ तुझे, जब मानवता रही नहीं

तुम्हारी गलती नहीं थी

Poem by Vikas Purohit
क्यूँ देखते हो हर बात में सिर्फ अपना अक्स
वो दौर बीत चुका है जब तुम ही दुनिया थे
हर बात शुरू होती थी सिर्फ तुमसे
और सारी कोशिशें भी थी
तुम्हे पाने की उम्मीद से ही
हां ये सही है कि कोई गलती नहीं है तुम्हारी
मगर ये भी उतना ही सही
कि बदल चुके हैं अब हालात
दिल तो वही है मगर उसे आदत नहीं
तुम्हे किसी और के साथ देखने की
अकेला रह सकता है, खुश ना सही
मगर मशगूल अपनी धुन में ही
जो कहता हूँ वो मैं नहीं होता
वो शख्स कोई और है
चाहे रहता हो मुझ में ही
उसकी बातों से चाहे तुम्हे लगे 
मगर निशाना होता हूँ मैं ही 
 छोड़ रखा है सब कुछ वक्त के भरोसे
तुम्हे दिया है मौका
ताकि आ सके फिर से हसीं
देखी थी तुम्हारी तस्वीर उस शख्स के साथ
लगा जैसे वक्त लगा रहा है मरहम
चेहरे से थोड़ा खुश लग रही थीं तुम
उसके साथ वो तुम्हारा लिखा “हम”
बस उस दिन के बाद रोक लिया खुद को
रोक लिया फिर से जुड़ने से इस पुल को 
रोक लिया इस नदी में बहने से खुद को
डूबना बेहतर लगा
सूखे किनारे पर पहुंचने से
और तुम्हे लगा कि मैं बदल गया
बदला नहीं बस इतनी सी बात है
तुम्हे गिरता देखने से पहले संभल गया
और हां एक आखिरी बात दोहराऊंगा फिर से
तुम हर बात में बिलकुल सही थीं
मैं कुछ भी लिखूं मगर
तुम्हारी कुछ भी गलती नहीं थी