Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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तन्हाई

पहले तुम थी अब ये तन्हाई है
मगर तन्हाई भी तो तुम्हे ही लाई है
बन गई है मेरी
साँसों की तरह
कुछ रहे न रहे ये रहेगी
आखिरी दम तक
बेशक ज़माने ने छीन लिया है तुम्हे मुझसे
मगर ना छीन सकेगा
इस तन्हाई को
और उसमे बसी हुई तुमको
पहले भी तुम थी,
अभी भी तुम हो
फर्क सिर्फ इतना है कि अब
सिर्फ तुम सुनती हो
कहती कुछ नहीं
कुछ पूछता हूँ तुमसे
तो याद दिला देती हो कोई गुजरी बात
और मुझे मिल जाता है
मेरे हर सवाल का जवाब

इंतज़ार

मैं कब से वो नज़र तलाश करता हूँ
ना जाने कब से तेरा इंतज़ार करता हूँ।

दिल में आये तो दरिया हो जाए
कब से वो बाकियों को दरकिनार करता हूँ।

तेरा चेहरा चाहे जुदा हो सबसे जहां में
मगर हर शख्स में तेरा ही दीदार करता हूँ।

जो मिल जाओ तुम तो मुकम्मल हो जहां
बस तुम्हारा ही यहाँ ऐतबार करता हूँ।

खून हर किसी का अब उबाल में है

कौन नहीं जानता कि वो किस हाल में हैं
गीदड़ छुपे हुए शेर की खाल में हैं

बहुत उड़ रहे थे परिंदे बन के ख़्वाबों में
नींद से जागे तो जाना पड़े नाल में हैं

चाहे लाख झुठलाने की कोशिश करे मगर
नियत उनकी भी बेईमानी के माल में है

जितना चाहे मुस्कुरा लो पैसों की भीड़ पर
पर इस बार जनता भी तुम्हारी ही चाल में है

तूने तो कोई कसर ना रखी थी मगर
उपरवाले का रहम कब से मेरी ढाल में है

ये तो भला है कि जिन्दा हो तुम अब तक
वरना हम तो कब से मौके के ख्याल में हैं

ये समझ ले कि वक्त पूरा हो चुका है तेरा
कि खून हर किसी का अब उबाल में है

चुनाव आते ही

मुझे पता है तुम
वही करोगे फिर से
चुनावआते ही
वही वादेफिर से,
वहीघोषणाएं फिर से
मगरनहीं समझोगे कि
दिलतोड़कर जोड़ने से
रहजाती है दरारें
झांकते हैं जिनमे से
जख्म, दर्द, हर वक्त
तन पर कपड़ा डालने से
नहींलौट आती लुटी आबरू
नाही अब खाना देने से
पायेगी लौट कर
उनभूखी रातों की नींद
तुमसमर्थ हो
सबकुछ भूल कर
मुस्कुराने में
मगरहमने तो सहा है सब
कैसे भूलेंगे हर पल
टूटते सपनोको
अपनीमजबूरियों को
भूखसे नीचे दब कर
देशके लिए कुछ ना
करपाने की बेबसी को
मगरतुम नहीं समझोगे ये सब
करोगेढोंग अच्छे बनने का फिर से
औरभी सब कुछ वही फिर से
जोकरते हो हर बार
चुनाव आते ही

मेरे रेल का सफ़र

बाहर शोर शराबा, भीतर एक सन्नाटा
जैसेदर्शक बन कर सफ़र ये मैंने काटा
सबकुछ जैसे आतुर, दिल मेंबस जाने को
कोशिश कर रहे हैं मुझमे मिल जाने को
अजनबी सारे चेहरे, नकाब रखे हैं पहने
चेहरों से ज्यादा सबके चमक रहे हैं गहने
नकलीमुस्कान लगाए हर बात पे आँख मिलाये
सच्चाई जान कर भी, दिल कैसेयकीं लुटाये
व्यस्त अपनी अपनी पीड़ा सब कहने में
वीरबड़े हैं लगते, तकलीफेंसब सहने में
हालतसाझा कर के साझा ढानढस बंधाते
परिवार से भी ज्यादा खुद अपना स्नेह लुटाते
कैसेकह रहे हैं, सब अपनीनिज गाथाएँ
कोशिशमें हैं जैसे, सबकी आँखोंमें छा जाएँ
कौनकरेगा याद कल इनमे सेकिसी को
फिरमिल भी ना पाएंगे जिंदगी में कभी तो
कितना सच, कितना झूठ, कोई नहीं बुझेगा
मेरामैं तो जानूं, फिर क्योंपूछूं दूजे का
कुछसफ़र ख़त्म करते हैं, कुछ उनकीजगह हैं लेते
शामिलहोते सबकी आधी बातों के बीच में से
कोईसाफ़ करेगा फर्श, अपने मैलेकपड़ों से
साफ़करके बोलेगा ना, मांगेगाबस नज़रों से
कोईकरेगा मेहनत कुछचीजें बेचने की
रुक, बाट देख लेगा, बच्चों केदेखने की
लगताहै जैसे जीवन भी होता है एक सफ़र ही
तयकरना है अकेले, होगा नाहमसफ़र भी
लम्हें, लोग, साथी, आयेंगे जायेंगे
बस उनकी बातें, किस्से, निशां रह जायेंगे
गम, ख़ुशी, वादे , कुछखट्टी, मीठी यादें
कुछउनमे रह जायेंगे, कुछ मुझमेरह जायेंगे
कुछ उनमे रह जायेंगे, कुछ मुझमेरह जायेंगे

हर पल मैं ही

दिल परेशां सा फिर हुआ है आज 
कहीं तुमने कुछ कहा तो नहीं दिल में 
एक आवाज़ आई है कानों में मेरे 
कहीं तुमको कुछ कहा तो नहीं किसी ने 
लब खामोश हैं मगर दिल धड़क रहा है 
जैसे लहरें उठ रही हो दूर गगन में कहीं 
तुम पास हो तो सही मगर पास नहीं 
चाह कर भी कुछ ना कर पाऊं मैं 
मगर तेरे दिल की धडकनों में शामिल
हर पल मैं ही 
हर पल मैं ही 

कोई ऐसा काम करूँ मैं, एक मरुँ एक लाख बनूँ मैं

रक्त मेरा आज क्यूँ लगने लगा है खौलने 
हर दिन, घडी, हर पल लगा है जिंदगी को तौलने 
रास्ते हज़ार है तो लाख है रूकावटे 
रुकना नहीं है, दिल से मेरे रही है आहटें 
आहटों में मुझको मेरा अक्स है पुकारता 
रुक ना जाऊं, थक ना जाऊं, बस यही है चाहता 
चलना है मुझको अनवरत, मंजिल की राह अब चुनूँ मैं 
कोई ऐसा काम करूँ मैं, एक मरुँ एक लाख बनूँ मैं
दुनिया के सारे रास्तों की अब हदों को तोड़ दूँ 
इंसान को इंसानियत से अब सदा को जोड़ दूँ 
जोड़ दूँ बिखरे हुए बैठें हैं अब जो राह मे
हौसलों को छोड़ कर मंजिल की है जो चाह मैं 
आसमां को पाने की ललक जो उनमे डाल दूँ 
बिखरे हुए सुरों से सबको एक नई मैं ताल दूँ 
नींद से जागा हूँ अब तो, अब कोई तो ख्वाब बुनूँ मैं 
कोई ऐसा काम करूँ मैं, एक मरुँ एक लाख बनूँ मैं
जिंदगी है नाम जीने का, नहीं है काटना 
काटना है अब ग़मों को, जिंदगी है बाटना 
जिंदगी है देश की, अब देश पे लुटाऊं मैं 
ख्वाब तिरंगे को अब कफ़न मेरा बनाऊं मैं 
मिट भी जाये सांस मेरी, अब वतन के वास्ते 
देशभक्तों संग चलूँ मैं, मेरे अंतिम रास्ते 
आखिरी मुकाम पे मिटटी हो, इन्कलाब बनूँ मैं 
कोई ऐसा काम करूँ मैं, एक मरुँ एक लाख बनूँ मैं

मैं समय का बहता दरिया हूँ

ना गुजरी बाते कहता हूँ, ना बीते सपने बुनता हूँ
मैं समय का बहता दरिया हूँ, बस आज के पल में रहता हूँ
कहना सुनना सब हो ही चुका, बाकी कुछ भी रखता हूँ..
खुली हुई किताब हूँ मैं, पर्दों में ना खुद को रखता हूँ..
होता है सब अच्छा ही सदा, यह बात दिल में रखता हूँ..
फूलो का मैं एक बाग़ हूँ जो, काटों की जगह भी रखता हूँ
बीते लम्हों पर रोने का, वक़्त नहीं रखता हूँ मैं..

आँखों में सपने जीवन के और दिल में जज्बा रखता हूँ..

चाहूँ अब मैं कुछ भी नहीं

सब कुछ है तो सही मगर लगता जैसे कुछ भी नहीं 
क्या तुम ही हो मेरी सब कुछ, क्या तुम बिन मैं नहीं 
यादों में तो हो, मेरी बातों में भी हो 
मेरी जीने की वजह क्या तुम बिन कुछ नहीं 
हर लम्हा मुझमे तुम, जीता हूँ संग तुम्हारे 
मिलना हो या ना हो, चाहे जीते दिल या हारे 
रहोगी तुम आखिर तक, साँसे हैं मेरी जब तक 
सुनती हो मेरी बातें, पर क्यूँ कहती कुछ नहीं 
चाहे हूँ नहीं मैं अब तो, तेरी जिंदगी में शामिल
शायद देर कर दी मैंने, बनने के तेरे काबिल  
अफ़सोस क्यूँ करूँ मैं  तेरे जुदा होने का 
क्या बिन मिले भी उम्र भर, ये प्यार कुछ नहीं  
चल करते हैं अब ये सौदा हम पूरी जिंदगी का  
तेरी यादे मेरा जीवन, मेरा दिल, तुम धड़कन 
तेरा सब कुछ, मेरी तुम, उन तस्वीरों में हम तुम 
रातें मेरी ख्वाब तेरे, ख़्वाबों में तू पास मेरे 
हर चेहरे में तू हो बस, देखूँ मैं खुद को भी जब 
इतना सब कुछ तो है अब फिर भी तू जो पास नहीं 
सब कुछ है तो सही मगर लगता जैसे कुछ भी नहीं 
पर खुश हूँ अपनी दुनिया में,चाहूँ अब मैं कुछ भी नहीं 
चाहूँ अब मैं कुछ भी नहीं 

मैं माफ़ी के काबिल ना हूँ, करना ना तुम माफ़ मुझे

जान तेरी जो ले ली बहना, मेरे वंश के लोगों ने 
मैं माफ़ी के काबिल ना हूँ, करना ना तू माफ़ मुझे 
बेशक उनमे शामिल ना हूँ, पर मैं भी अपराधी हूँ 
रोक नहीं पाया ये सब कुछ, कहीं तो मैं भी दोषी हूँ 
जो वो अब तक जिन्दा हैं, दे पाया ना इंसाफ तुझे 
मैं माफ़ी के काबिल ना हूँ, करना ना तू माफ़ मुझे 
तुम लेटी थी सड़कों पर, मैं जो पास से गुजर गया 
ना तन पे कपडे डाले, ना दे पाया मैं हाथ तुझे 
तुम रोती थी, कहती थी, कोई है जो मदद करो 
तेरी उस हालत को तक कर आई ना थी लाज मुझे 
दानव नहीं बना किंतु तुम कहना ना इंसान मुझे 
मैं माफ़ी के काबिल ना हूँ, करना ना तुम माफ़ मुझे 
मैं सड़कों पर उतरा था, तेरी खातिर लड़ता था 
कुछ बन्धु थे साथ मेरे, मैं सरकारों से भिड़ता था 
जिनसे न्याय मैं मांग रहा था, वे भी कुछ ना कर पाए 
कुछ दोषी उनमे भी शामिल है, तब लगते वो लाचार मुझे 
चुना भी उनको मैंने ही तो, पछतावा क्यूँ आज मुझे 
मैं माफ़ी के काबिल ना हूँ, करना ना तुम माफ़ मुझे  
मैं उस बेटे का वालिद जो मान तुम्हे ना दे पाया 
है मेरी भी गलती जो मैं ज्ञान उसे ना दे पाया 
जो मैं बचपन से उसको तेरा सम्मान सिख देता 
तो आज शर्म ना आती यूँ, कहते उसको अपना बेटा 
संस्कार दे पाया ना, अब लगता है अपमान मुझे 
मैं माफ़ी के काबिल ना हूँ, करना ना तुम माफ़ मुझे