Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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मनहूसियत के परे

मुझे मनहूस लोगों से सख्त चिढ़ होती है, अब आप कहेंगे कि मनहूस भला कोई कैसा होता है?

मनहूस वो होता है जो खुद तो दुखी रहता ही है साथ ही अपने आस पास और खुद से जुड़े लोगों को भी दुखी करता है, उसे ऐसा लगता है कि उसकी जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं हुआ आज तक और न ही कभी होगा, उसे खुद का पैदा होना भी एक दुर्घटना लगती है और तो और उसे ऐसा तक लगता है कि भगवान् ने दुनिया बना कर बहुत बड़ी गलती की है, क्या जरुरत थी खामखाँ ये दुनिया बनाने की ऐसा कौनसा पहाड़ टूट रहा था।
मुझे हर वक्त शिकायत करने वाले और परिस्थितयों का रोना रोने वाले लोगों को देख कर घिन्न आती है क्योंकि ऐसे ही लोग होते हैं जो सिर्फ समस्या देखते हैं, दोष देते हैं और कमियां निकालते हैं मगर समाधान, इलाज ढूंढने की कभी कोशिश नहीं करते। मैं मानता हूँ कि दुनिया की कोई भी ऐसी समस्या नहीं जिसका समाधान नहीं, कोई ऐसी मंजिल नहीं जिसका रास्ता न हो, जरुरत होती है तो बस सकारात्मक रह कर उस दिशा में प्रयास करने की। ऐसे तो इयरफोन भी रोज उलझ जाता है मगर उसे सुलझा कर ही हम गाने सुन सकते हैं तो जिंदगी भी क्या हुआ जो रोज उलझ जाती है, क्या हुआ जो एक समस्या सुलझते ही दूसरी समस्या आ जाती है, जिंदगी जीने का मजा उसके बाद ही है।
और एक खासियत ऐसे लोगों की ये होती है कि ये भूतकाल से निकलना ही नहीं चाहते, जब भी कुछ समस्या आती है ये बार बार भूतकाल को याद कर के पछताते रहते हैं। इन्हें कौन समझाए कि उसी भूतकाल के चक्कर में ये वर्तमान में दुखी हैं और इस दुःख में अपने भविष्य को भी बिगाड़ रहे हैं। इन्हें समाधान बताना खुद को दुखी करने के बराबर है क्योंकि जब तक कोई खुद अपने दिल से खुश होना नहीं चाहेगा तब तक दुनिया की कोई भी ताकत उसे खुश नहीं कर सकती। अगर कोई दुःख में ही आनंद पाता है तो उसे दुनिया का कोई भी सुख आकर्षित नहीं कर सकता।
आप कहेंगे कि ऐसे लेक्चर झाड़ना बहुत आसान है असल जिंदगी में लड़ना बहुत मुश्किल पर मैं आपको बता दूं कि लगभग हर इंसान की जिंदगी में ऐसा एक वक्त जरूर आता है जब उसे लगता है कि अब आगे कोई रास्ता नहीं, जिंदगी ख़त्म कर देनी चाहिए मगर जो उस दौर को हिम्मत रख कर गुजार देता है वही एक विजेता बन कर उभरता है।
वक्त तो कैसा भी हो गुजर जायेगा मगर आप गुजर गए तो फिर लौट नहीं पाएंगे इसलिए कोशिश कीजिये कि बुरे वक्त को खुश रह कर जल्दी से जल्दी गुजर जाने में मदद कर सकें।

नागपंचमी

इनकी मृत आत्माओं को आओ फिर से जिलाएँ हम
आज नागपंचमी है यारों इनको दूध पिलाएँ हम

तोप, कोयला या मिट्टी हो, सब कुछ पच जाता इनको
भर जाये इनका मन आखिर, ऐसा क्या खिलाएं हम।

डरते नहीं ये ईश्वर से भी ऐसा मुझको लगता है
एक बार चलो तो आज, इन्हें इनसे ही मिलाएं हम।

फ़र्ज़ भुला बैठे हैं जो अब, सत्ता के गलियारों में
इस कुर्सी के असली मालिक इनको याद दिलाएं हम।

बहुत हो गया अब दुःख सहना, आस्तीन के लोगों से
इन लोगों के बिलों में घुस कर इनको आज जलाएं हम।

————–विकास पुरोहित “पूरवे”

ईमानदारी का दूसरा पहलू

राज्य में नई नई ईमानदार सरकार आई है, हर कोई खुश है कि चलो अब तो भ्रष्टाचार ख़त्म होगा, अब कोई भी रिश्वत नहीं लेगा, अब हमारा काम सरकारी व्यवस्था द्वारा पूरी ईमानदारी से किया जायेगा| खैर ये तो लोगों की सोच है और इसी सोच ने ये सरकार बनाई है मगर एक बात ये भी है कि जब हम किसी बात का समर्थन करते हैं तो हमें सिर्फ एक ही पक्ष दिखाई देता है क्योंकि दूसरा पक्ष हम ना तो देखना चाहते है और ना ही कोई दिखा दे तो उस पर यकीन कर सकते हैं|

अब आप सोचेंगे कि ईमानदारी में भी खोट भला कोई कैसे निकाल सकता है तो मैं आपको बता दूँ कि इस तस्वीर का एक और पहलू भी है और वो ये कि बदलाव तभी संभव है जब हम खुद को बदल सकें| अब ज्यादा दार्शनिक ना होते हुए किस्सा शुरू करता हूँ, हुआ ये कि पड़ोस में रहने वाले कलुआ चाचा ऑटो रिक्शा चला कर अपना परिवार चला रहे हैं पिछले 20 सालों से, चाहे किसी की भी सरकार रही हो उन्होंने कभी ना तो शिकायत की और ना ही तारीफ़, जब भी उनसे सरकार के बारे में पूछा जाता तो बस एक ही बात कहते कि बेटा सब अपनी अपनी किस्मत का खा रहे हैं, मेहनत कर के दो वक्त की रोटी कमाता हूँ, सरकार भला क्या करेगी मेरा, मुझे खुद ही मेरा परिवार चलाना है|

इस बार भी जब नई सरकार बनी तो कलुआ चाचा ने वही पुराना जवाब दिया, लेकिन थोड़े ही दिन बाद अचानक मुझे मिले तो जम कर सरकार को कोसने लगे, कहने लगे ये भी कोई सरकार है, गरीबों का बिलकुल भी नहीं सोचती, ऐसी ईमानदारी भी भला क्या काम की जो हमारे पेट पर लात मार दे, एकाएक तो मुझे भी समझ नहीं आया कि आखिर इस सरकार ने ऐसा कौनसा फैसला ले लिया जो गरीबों के खिलाफ है तो मैंने उन्हें पूरी बात बताने को कहा, चाचा कहने लगे बेटा हुआ ये कि इतने वक्त तक मैं रिक्शा चला कर अपना घर चलाता रहा कभी भी तकलीफ नहीं आई, एक साथ 7 लोगों तक को बिठाया है मैंने अपने रिक्शा में वो भी बिना किसी की परवाह किये, स्कूल के बच्चों को भी आगे पीछे मिला कर 15 बिठा लेता था, बड़े आराम से काम चल रहा था, कभी कभार पुलिस वालों ने पकड़ भी लिया तो 100-50 देकर काम निकाल लिया पर अपनी रोजी पर फर्क नहीं पड़ा, पर जब से ये ईमानदारी का ढोल पीटने वाली सरकार आई है तब से पुलिस वाला है कि मानता ही नहीं, मैंने उसे इतना समझाया कि 100 की जगह 200 ले ले मगर जाने दे मगर कहता है हमें रिश्वत लेकर मरना नहीं है, चुप चाप अपना चालान कटवाओ, अब बेटा तू ही बता रोज रोज चालान कटवाऊंगा तो घर का खर्चा कैसे चलेगा, ऐसी ईमानदारी भी भला किस काम की|

चाचा तो अपनी बात कह कर निकल लिए मगर मैं सोचता रहा कि क्या ईमानदारी के भी अपने नुकसान होते हैं|

इस अधूरी सी चाह पर

सब जानते, समझते हुए भी
इन आँखों ने बरसते हुए भी
खुद को पत्थर का कर के
एक शीशे सा खुद को बिखरते
देखा है अक्सर तुझको
बेबस सा पाकर खुद को

हर बार तेरे आंसू
तुझसे ज्यादा मुझे रुलाते हैं
हां ये सच है कि वो लम्हें
मुझे भी फिर से बुलाते हैं
मगर ये भी सच है उतना
कि ये दौर तो आना था
रास्ते की शुरुआत से ही
मालूम ये ही ठिकाना था

अब जरुरी है मेरा बदलना
थोडा इस आग में जलना
जानता हूँ कि तकलीफ होगी
पर यही हालत अब ठीक होगी
वक्त लगेगा सब सुधरने में
तुझे इस सब से उबरने में

खैर अलविदा कहना ही होगा
ये गम अब सहना ही होगा
हो सके तो खुद को समझा लेना
इस इश्क की लौ को बुझा लेना
फिर मिलेंगे किसी जन्म में
किसी अनजान सी राह पर
लेता हूँ विदा तुमसे अब मैं
दिल की इस अधूरी सी चाह पर

एक माँ ही

Poetry on father by Vikas Purohit

बहुत कुछ लिखने को

लिखा जाता है माँ पर

कोई तो लिखे पिता पर भी

प्यार जिनका अक्सर

रह जाता है अनकहा

करना पड़ता है बस महसूस

अपनी ख़ुशी में देखनी होती है

उनकी आँखों की चमक

अपनी बेबसी में उनकी व्यथित आँखें

बिना जताये सब कुछ करने की आदत

माँ का आदर करने पर

उसी तरह खुश होते हैं पिता

अपनी सारी तकलीफें,

एक मुस्कान में भूलने की

वो मासूमियत

क्या लिखूं कि वो देखते हैं

मुझे हर पल

अनजान बने रह कर भी

पूछते हैं मेरा दुःख

अकेले में माँ से

समझते हैं चेहरे का हर भाव

बिलकुल माँ की तरह

लगता है जैसे माँ से भी ज्यादा

नाज़ुक है इनका दिल

आखिर पिता भी तो

होते हैं एक माँ ही”

बेहतर है मैं प्यार लिखूं

Poem by Vikas Purohit

ऊंच नीच और ज्ञान की बातें 
बाँट देती है लोगों को 
सबको जोड़े रखने को अब 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

कहाँ का नेता, कहाँ का चमचा 
मिले वोट बस वहीँ पे थम जा 
लड़ जा, भिड़ जा, कट जा, पिट जा 
नेताओं के खातिर मिट जा 
मेरा नेता, तेरा नेता 
कौन है बाप और कौन है बेटा 
इन सब बातों में पड़कर अब 
काहे मैं तकरार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

मरे जो कोई मर जाने दो 
लुटे जो कोई लुट जाने दो 
सब चालू है, सब फ़र्ज़ी हैं 
इन सबकी खुद की मर्ज़ी है 
हमने तो कब से साहबों को 
डाल रखी कितनी अर्ज़ी है 
भूख, गरीबी नहीं है कुछ भी 
और ना भ्रष्टाचार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

वो देखो वो मुन्नी, शीला 
किसका कितना दिल है ढीला 
नाचो गाओ कुछ ना सोचो 
नेताओं का सर ना नोचो 
कांड करे सो कांडा भाई 
घास चरे सो लल्लू 
ये सब तो हैं बड़े लोग 
बस हम ही एक निठल्लू 
न्याय के मंदिर में निर्धन की 
अब तो सदा ही हार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

वो है कमतर, वो है बेहतर 
क्या मिलता है ये सब कह कर 
नेतागीरी का लगा है मेला 
सबके साथ है सबका चेला 
देश बेचकर खा लेंगे पर 
हमको नहीं मिलेगा धेला 
लड़ कर भी जब मिले ना कुछ भी 
क्यों मैं हाहाकार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

मानव कैसे कहूँ तुझे

Poem on Rapists by Vikas Purohit
पशु कहूँ, हैवां कहूँ या कोई लाऊं शब्द नवीन
मानव कैसे कहूँ तुझे, जब मानवता रही नहीं
क्रूर कहूँ, जालिम कहूं, दुष्कर्मी, हृदयहीन
खून तेरा पानी हुआ, जो तू पिघला ही नहीं
 
एक पल भी ना सोचा तूने, तू भी बेटा है, भाई है
जो तूने हैवां होने की अब सारी हदें गिराई हैं
सोचा ना तूने इस तन में, एक दिल भी हरदम रहता है
उम्मीदें रखने वाला तुझसे, एक पिता तेरे घर बसता है
हर ख्वाहिश, दुआ जो तुझे मिली, उन सबकी साख गवाई है
हम मानव हैं, कोई चीज़ नहीं, तूने ये बात भुलाई है
 
बेशर्म कहूँ, पापी कहूँ, तू दया हया विहीन
मानव कैसे कहूँ तुझे,जब मानवता रही नहीं
 
जबसे तेरी ये रूह बिकी, हर कदम पे तू शैतान हुआ
तेरे जैसों के कारण ही, हर पुरुष यहाँ बदनाम हुआ
कैसे दिलवा पाउँगा मैं, अब यकीं यहाँ हर लड़की को
कल सबने देखा है उसको, उस बहन का जो अंजाम हुआ
हर शख्स यहाँ मुजरिम लगता, ये तेरी ही तो कमाई है
इंसानियत शर्मसार करने की कसम तूने खाई है
 
जल्लाद है तू, दुष्ट कहूँ, दानव खर, कुलहीन
मानव कैसे कहूँ तुझे, जब मानवता रही नहीं

तुम्हारी गलती नहीं थी

Poem by Vikas Purohit
क्यूँ देखते हो हर बात में सिर्फ अपना अक्स
वो दौर बीत चुका है जब तुम ही दुनिया थे
हर बात शुरू होती थी सिर्फ तुमसे
और सारी कोशिशें भी थी
तुम्हे पाने की उम्मीद से ही
हां ये सही है कि कोई गलती नहीं है तुम्हारी
मगर ये भी उतना ही सही
कि बदल चुके हैं अब हालात
दिल तो वही है मगर उसे आदत नहीं
तुम्हे किसी और के साथ देखने की
अकेला रह सकता है, खुश ना सही
मगर मशगूल अपनी धुन में ही
जो कहता हूँ वो मैं नहीं होता
वो शख्स कोई और है
चाहे रहता हो मुझ में ही
उसकी बातों से चाहे तुम्हे लगे 
मगर निशाना होता हूँ मैं ही 
 छोड़ रखा है सब कुछ वक्त के भरोसे
तुम्हे दिया है मौका
ताकि आ सके फिर से हसीं
देखी थी तुम्हारी तस्वीर उस शख्स के साथ
लगा जैसे वक्त लगा रहा है मरहम
चेहरे से थोड़ा खुश लग रही थीं तुम
उसके साथ वो तुम्हारा लिखा “हम”
बस उस दिन के बाद रोक लिया खुद को
रोक लिया फिर से जुड़ने से इस पुल को 
रोक लिया इस नदी में बहने से खुद को
डूबना बेहतर लगा
सूखे किनारे पर पहुंचने से
और तुम्हे लगा कि मैं बदल गया
बदला नहीं बस इतनी सी बात है
तुम्हे गिरता देखने से पहले संभल गया
और हां एक आखिरी बात दोहराऊंगा फिर से
तुम हर बात में बिलकुल सही थीं
मैं कुछ भी लिखूं मगर
तुम्हारी कुछ भी गलती नहीं थी

एक महान इंसान

Morning Experience

आज सुबह सुबह एक महान इंसान से बात करने का मौका मिला, नाम से अगर गूगल पर सर्च करेंगे तो शायद ही मिल पाएं मगर उनकी बातें सुन कर जरूर लगा कि बहुत महान हैं। और उन महान इंसान ने मुझ जैसे तुच्छ इंसान के आगे अपनी महानता का बखान केवल इसलिए किया ताकि मुझे ये अहसास हो सके कि वो मुझसे बात कर के कितना बड़ा अहसान कर रहे हैं मुझ पर।

अच्छा तो बात को जरा लम्बा ना खींचते हुए सीधा सीधा वो सब कहता हूँ जो वो कहना चाहते थे अपने दिल में:-
” तुम्हे जरा भी अंदाजा है कि तुम किससे बात कर रहे हो, तुम शायद मुझे नहीं जानते इसीलिए मेरी आलोचना कर रहे हो, अरे तुम्हे क्या पता है, मैंने बचपन से लेकर आज तक हज़ारों किताबें पढ़ी हैं वो भी ऐसे ऐसे लेखकों की जिनके नाम तक तुमको नहीं पता होंगे, हज़ारों किलोमीटर का सफर किया है, इस दुनिया के जितने भी बड़े बड़े समझदार लोग है और बुद्धिजीवी हैं वो सब मेरी जान पहचान के हैं, मैंने खूब समाजसेवा के काम किये हैं, मेरे पास बहुत पैसा है मैं चाहता तो ऐशो आराम की जिंदगी बिता सकता था मगर मैं घूमता रहा और गरीबो के बीच में जा जाकर फोटो खिंचवाता रहा, आप मेरी आईडी देखोगे तो उसका सबूत मिल जायेगा, ये मेरा बड्डपन ही तो है जो मैं तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में शामिल हूँ, और क्या बात करते हो यार कि नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल देश का भला करेंगे, देश का भला सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस कर सकती है और आज तक करती भी आई है, तभी तो याद करो एक वो वक्त था जब तुम घर के बाहर नाली में निपटने जाते थे और आज खुद के घर में संडास में बैठे बैठे फेसबुक चला रहे हो, अगर कांग्रेस ना होती तो तुम्हारा बिलकुल भी भला नहीं होता, हां हां जानता हूँ कि लहर चल रही है, मगर ये सब लोग मूर्ख हैं, आने वाले वक्त में इन्हे इनकी गलती का अहसास होगा और पता चलेगा कि मैं कितना महान हूँ, खैर तुमने किया ही क्या है, अपनी जिंदगी ख़राब ही तो की है अभी तक, ना मेरी तरह हज़ारों किताबें पढ़ी ना कोई समाजसेवा का काम किया, अगर किया है तो डालो उसकी फोटो फेसबुक पर, आखिर मुझे भी तो पता चले। ” और देखो मैं कितना विनम्र हूँ जो इतना महान होकर भी तुमसे बात कर रहा हूँ।

तारीफ के लायक

Determined

मन बहुत भारी हो रहा है, वैसे किसी को लग सकता है कि रात के 1 बजे मन भारी हो रहा है तो जरूर कोई प्यार व्यार का चक्कर होगा मगर ऐसा कुछ नहीं, नींद तो आ रही है मगर सो गया तो मन की बात मन में ही रह जाएगी, लिखने के सिवा कोई और रास्ता भी नहीं खुद का दिल हल्का करने का। बस ऐसा लग रहा है जैसे कुछ किया ही नहीं जिंदगी में अभी तक, कुछ भी ऐसा जिस पर गर्व कर सकूँ, हां वैसे लिखते लिखते याद आया कि कुछ किया तो है जिससे दिल को थोड़ा सुकून मिल रहा है मगर पूरी जिंदगी के लिए उतना काफी नहीं, और ना ही ऐसा जिसे बता कर उसे करने की ख़ुशी को ख़त्म कर दूँ, बस ऐसा कुछ करना है जिससे दिल को भी ख़ुशी मिले और लोग भी प्रेरित हों। कोई ऐसा काम जिसकी लोग तारीफ करें तो लगे जैसे सच्ची तारीफ है, आज किसी दोस्त ने मजाक में कहा कि मैं तारीफ के लायक नहीं, मगर सच कहूँ तो इस एक बात ने पूरी जिंदगी को एक पल में आँखों के सामने लेकर खड़ा कर दिया, सच ही तो कहा उसने कि मैंने ऐसा क्या किया है जिसकी तारीफ की जा सके, बस कुछ एक परीक्षाएं पास की है जो कोई भी पढ़ कर पास कर सकता है, शक्ल सूरत मैंने नहीं बनाई तो उसकी तारीफ मेरी तारीफ नहीं हुई, फिर क्या किया, कुछ भी तो नहीं जिसकी तारीफ की जा सके। बड़ा गर्व करता हूँ खुद ही खुद को लेखक कह कर, मगर क्या इस कलम ने किसी का भला किया है अभी तक, नहीं ना, की है तो सदा खुद की तारीफ या दूसरों की बुराई या अधिक से अधिक समाज में जो फैली बुराई है उसे दिखने की कोशिश की है कभी कभार, मगर इतना काफी नहीं, ऐसा नहीं की तारीफ की जा सके।

अभी तक बस साधन की तलाश में लगा हूँ, ताकि जो साध्य हैं उन्हें साध सकूँ, मगर इतनी देर हो रही है कि सब्र नहीं किया जा रहा, हिम्मत धीरे धीरे छूट रही है, बस उम्मीद के दम पर कोशिशों में लगा हूँ, लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट हैं बस रास्ता ही है जो बार बार अलग अलग मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर देता है। इतना यकीं है कि एक दिन वो जरूर आएगा जब अपने लक्ष्य पूरे कर पाउँगा और वो सब कुछ हासिल कर पाउँगा जो सिर्फ अभी तक मन में है, सोचा बहुत बड़ा है और इसीलिए साधन जुटाने में वक्त लग रहा है और वो भी तब जब परिस्थितियां कई बार प्रतिकूल हो जाती हैं। ना तो लेखक बनना लक्ष्य है और ना ही नाम कामना, लक्ष्य तभी बताऊंगा जब उसे हासिल करने की तरफ थोड़ा और आगे बढ़ जाऊंगा।

आज खुद के साथ उस दोस्त को भी दिल से कहना चाहूंगा कि तुम्हारा बहुत शुक्रिया और हां मैं तुम्हे यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हे एक दिन मेरी तारीफ करने लायक जरूर कुछ कर के दिखाऊंगा और शायद तुम्हे ये गर्व करने का मौका भी दे सकूँ कि मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।

मीडिया: वकील या जज?

Media: Judge or Lawyer
हाँ ये सही है कि मीडिया का काम जनता की नब्ज को पहचानते हुए उनसे जुडी खबरें दिखाना है, मगर यदि कोई उंगली उठाता है मीडिया पर तो इसे सभी स्वीकार करेंगे कि मीडिया को भी आत्ममंथन की जरुरत है, कहीं  कहीं मीडिया अब तथ्य रखने के बजाय फैसले सुनाने लगा है, जनता का वकील होने की बजाय जज होने लगा है तभी उस पर उंगलियां उठ रहीं हैं।
खैर मेरा मुद्दा तो बस इतना है कि जिस मीडिया को देश को एकजुट करने और जातिबंधनों से मुक्त करने की दिशा में कुछ काम करना चाहिए था वही अब उसको बढ़ाने में लगा है, रोज के नए नए सर्वे देखता हूँ जिसमे हर प्रदेश के लोगों को जाति में, धर्म में बाँट कर बताया जाता है, जब ये सुनता हूँ कि इस जगह इतने ब्राह्मण वोट हैं, इतने दलित वोट हैं तो लगता है जैसे लोगों का अपना कोई महत्व नहीं, जैसे सब सिर्फ अपनी जाति देखकर वोट करते हैं, हां ये सही है कि ऐसा होता है काफी जगह, मगर जिस तरह से साक्षरता का स्तर बढ़ा है, लोगों तक टीवी की पहुँच बढ़ी है, ऐसे माहौल में कम से कम एक कोशिश तो की जा ही सकती है।  ऐसा किया जा सकता था कि आप किसी स्थान विशेष पर जातिगत समीकरणों की बजाय वहां के उम्मीदवारों का पूरा विवरण देते, उनकी आपस में तुलना करते ताकि लोग अपने विवेक से सही या गलत का फैसला कर के वोट कर सकते।
दूसरा एक और चीज़ जो अजीब लगती है वो ये कि कोई भी नेता जब किसी धर्मगुरु से मिलता है तो स्वाभाविक है उसे सभी लोगों से मिलना पड़ेगा ताकि हर किसी तक अपनी बात पहुंचा सके, इसमें कुछ भी गलत नहीं मगर ये बात तभी गलत हो जाती है जब कोई किसी मुस्लिम मौलानाओं से मिलता है, अरे भाई, जब वही नेता किसी हिन्दू धर्मगुरु से मिलता है तब तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होती तब तो कुछ नहीं कहा जाता मगर मुस्लिम धर्म गुरुओं से मिलते ही इसे तुष्टिकरण का नाम दे दिया जाता है।
क्या मुस्लिम इस देश के नागरिक नहीं हैं, क्या उनके धर्मगुरु के कहने मात्र से ही सारे मुसलमानों के वोट किसी एक को मिल जायेंगे, यकीं मानिये जितने समझदार आप हैंउ तने ही वो भी है, तुम अगर अपने पंडितों की बात मानकर किसी को वोट नहीं देते तो वो भी ऐसा ही करते हैं। इस मामले में मीडिया की जिस तरह से खबरें आती हैं वो साफ़ दिखती है कि उन्होंने इस जहर को बढ़ाने का काम किया है बजाय इसे एक स्वाभाविक क्रिया बताने के।

काश कि जनता से जुड़े मुद्दों पर और उम्मीदवारों के व्यक्तिगत योग्यताओं पर बात होती बजाय सिर्फ एक ही प्रकार की खबरें दिखानेके।

उम्मीदें एक बिंदु

Spreading Hope
जब  उम्मीदें एक बिंदु पर आकर टिक जाती हैं तो ऐसा ही होता है कि निराशा हाथ लगती है, अक्सर ऐसा होता है कि जिस एक चीज़ पर हम निर्भर हो जाएँ वही हमसे छूट जाती है। हम सोचते हैं कि सिर्फ ये हो जाने से सब कुछ आसान हो जायेगा और बस हम अपने हिसाब से जी सकेंगे, और अगले ही पल वो सपना टूट जाता है और इस तरह कि बस उसी ढर्रे पर जीने पर मजबूर होना पड़ता है।
लगता है जैसे सिर्फ मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ होता है, क्यूँ मन की बात मन में ही रह जाती है, क्यूँ जो चाहता हूँ वो कभी होता ही नहीं।
शायद सबको ऐसा लगता है, और यकीं करो एक दिन ऐसा भी आता है जब हमें अहसास होता है कि अगर वैसा ना हुआ होता तो बहुत पीछे रह गये होते, या पीछे ना भी रहते तो भी बस जिंदगी जी रहे होते, वैसे ये यकीन करने के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं कि “भगवान् जो करता है अच्छे के लिए करता है बस उस अच्छे की तलाश हम पर या वक्त पर छोड़ देता है”।
इससे बचने का बस एक ही रास्ता है और वो ये कि उम्मीदों को एक बिंदु पर केंद्रित करने की बजाय उसे एक वृक्ष की तरह या फिर हवा की तरह फैला दिया जाए और जिंदगी जी जाए इस तरह कि जैसे उम्मीदें पूरी होतीं रहेंगी रफ्ता रफ्ता, हमें भी कोई जल्दी नहीं, हो गई तो ठीक वरना ख़ुशी से जी तो रहे ही हैं।
वो कहानी तो सुनी होगी ना जिसमे एक राक्षस की जान एक गुड़िया में बसी होती है और जिस दिन वो गुड़िया टूटी उस दिन  उसकी जान भी चली गई, हम क्यूँ वो राक्षस बने, क्यूँ हमारी जान किसी एक चीज़ में बसी हो, हमारी जान तो बसी हो हर एक छोटी सी ख़ुशी में, ऐसे छोटे छोटे लम्हो में जो एक गया तो दूसरा आएगा। कोई और क्यूँ निर्धारित करे कि हमें कब खुश होना है और कब दुखी, ये हक़ सिर्फ हमें है और हमें ये हक़ है कि हम अपनी ख़ुशी बिखरा कर रखें उन सब लोगों कि तरह भी जिनके पास दुनिया की तमाम सुख सुविधाएँ तो नहीं होती मगर वो छोटी छोटी बातों पर अक्सर मुस्कुराते हुए देखे जा सकते हैं, गरीबी तब कही जाती है जब हम खुश होना चाह कर भी खुश ना हो पाएं।
उम्मीद के एक बड़े से बिंदु को हजारों पलों के टुकड़ों में बिखरने के इन्तजार में शुभ रात्रि।