Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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ईमानदारी का दूसरा पहलू

राज्य में नई नई ईमानदार सरकार आई है, हर कोई खुश है कि चलो अब तो भ्रष्टाचार ख़त्म होगा, अब कोई भी रिश्वत नहीं लेगा, अब हमारा काम सरकारी व्यवस्था द्वारा पूरी ईमानदारी से किया जायेगा| खैर ये तो लोगों की सोच है और इसी सोच ने ये सरकार बनाई है मगर एक बात ये भी है कि जब हम किसी बात का समर्थन करते हैं तो हमें सिर्फ एक ही पक्ष दिखाई देता है क्योंकि दूसरा पक्ष हम ना तो देखना चाहते है और ना ही कोई दिखा दे तो उस पर यकीन कर सकते हैं|

अब आप सोचेंगे कि ईमानदारी में भी खोट भला कोई कैसे निकाल सकता है तो मैं आपको बता दूँ कि इस तस्वीर का एक और पहलू भी है और वो ये कि बदलाव तभी संभव है जब हम खुद को बदल सकें| अब ज्यादा दार्शनिक ना होते हुए किस्सा शुरू करता हूँ, हुआ ये कि पड़ोस में रहने वाले कलुआ चाचा ऑटो रिक्शा चला कर अपना परिवार चला रहे हैं पिछले 20 सालों से, चाहे किसी की भी सरकार रही हो उन्होंने कभी ना तो शिकायत की और ना ही तारीफ़, जब भी उनसे सरकार के बारे में पूछा जाता तो बस एक ही बात कहते कि बेटा सब अपनी अपनी किस्मत का खा रहे हैं, मेहनत कर के दो वक्त की रोटी कमाता हूँ, सरकार भला क्या करेगी मेरा, मुझे खुद ही मेरा परिवार चलाना है|

इस बार भी जब नई सरकार बनी तो कलुआ चाचा ने वही पुराना जवाब दिया, लेकिन थोड़े ही दिन बाद अचानक मुझे मिले तो जम कर सरकार को कोसने लगे, कहने लगे ये भी कोई सरकार है, गरीबों का बिलकुल भी नहीं सोचती, ऐसी ईमानदारी भी भला क्या काम की जो हमारे पेट पर लात मार दे, एकाएक तो मुझे भी समझ नहीं आया कि आखिर इस सरकार ने ऐसा कौनसा फैसला ले लिया जो गरीबों के खिलाफ है तो मैंने उन्हें पूरी बात बताने को कहा, चाचा कहने लगे बेटा हुआ ये कि इतने वक्त तक मैं रिक्शा चला कर अपना घर चलाता रहा कभी भी तकलीफ नहीं आई, एक साथ 7 लोगों तक को बिठाया है मैंने अपने रिक्शा में वो भी बिना किसी की परवाह किये, स्कूल के बच्चों को भी आगे पीछे मिला कर 15 बिठा लेता था, बड़े आराम से काम चल रहा था, कभी कभार पुलिस वालों ने पकड़ भी लिया तो 100-50 देकर काम निकाल लिया पर अपनी रोजी पर फर्क नहीं पड़ा, पर जब से ये ईमानदारी का ढोल पीटने वाली सरकार आई है तब से पुलिस वाला है कि मानता ही नहीं, मैंने उसे इतना समझाया कि 100 की जगह 200 ले ले मगर जाने दे मगर कहता है हमें रिश्वत लेकर मरना नहीं है, चुप चाप अपना चालान कटवाओ, अब बेटा तू ही बता रोज रोज चालान कटवाऊंगा तो घर का खर्चा कैसे चलेगा, ऐसी ईमानदारी भी भला किस काम की|

चाचा तो अपनी बात कह कर निकल लिए मगर मैं सोचता रहा कि क्या ईमानदारी के भी अपने नुकसान होते हैं|