Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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इस अधूरी सी चाह पर

सब जानते, समझते हुए भी
इन आँखों ने बरसते हुए भी
खुद को पत्थर का कर के
एक शीशे सा खुद को बिखरते
देखा है अक्सर तुझको
बेबस सा पाकर खुद को

हर बार तेरे आंसू
तुझसे ज्यादा मुझे रुलाते हैं
हां ये सच है कि वो लम्हें
मुझे भी फिर से बुलाते हैं
मगर ये भी सच है उतना
कि ये दौर तो आना था
रास्ते की शुरुआत से ही
मालूम ये ही ठिकाना था

अब जरुरी है मेरा बदलना
थोडा इस आग में जलना
जानता हूँ कि तकलीफ होगी
पर यही हालत अब ठीक होगी
वक्त लगेगा सब सुधरने में
तुझे इस सब से उबरने में

खैर अलविदा कहना ही होगा
ये गम अब सहना ही होगा
हो सके तो खुद को समझा लेना
इस इश्क की लौ को बुझा लेना
फिर मिलेंगे किसी जन्म में
किसी अनजान सी राह पर
लेता हूँ विदा तुमसे अब मैं
दिल की इस अधूरी सी चाह पर