Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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तुम्हारी गलती नहीं थी

Poem by Vikas Purohit
क्यूँ देखते हो हर बात में सिर्फ अपना अक्स
वो दौर बीत चुका है जब तुम ही दुनिया थे
हर बात शुरू होती थी सिर्फ तुमसे
और सारी कोशिशें भी थी
तुम्हे पाने की उम्मीद से ही
हां ये सही है कि कोई गलती नहीं है तुम्हारी
मगर ये भी उतना ही सही
कि बदल चुके हैं अब हालात
दिल तो वही है मगर उसे आदत नहीं
तुम्हे किसी और के साथ देखने की
अकेला रह सकता है, खुश ना सही
मगर मशगूल अपनी धुन में ही
जो कहता हूँ वो मैं नहीं होता
वो शख्स कोई और है
चाहे रहता हो मुझ में ही
उसकी बातों से चाहे तुम्हे लगे 
मगर निशाना होता हूँ मैं ही 
 छोड़ रखा है सब कुछ वक्त के भरोसे
तुम्हे दिया है मौका
ताकि आ सके फिर से हसीं
देखी थी तुम्हारी तस्वीर उस शख्स के साथ
लगा जैसे वक्त लगा रहा है मरहम
चेहरे से थोड़ा खुश लग रही थीं तुम
उसके साथ वो तुम्हारा लिखा “हम”
बस उस दिन के बाद रोक लिया खुद को
रोक लिया फिर से जुड़ने से इस पुल को 
रोक लिया इस नदी में बहने से खुद को
डूबना बेहतर लगा
सूखे किनारे पर पहुंचने से
और तुम्हे लगा कि मैं बदल गया
बदला नहीं बस इतनी सी बात है
तुम्हे गिरता देखने से पहले संभल गया
और हां एक आखिरी बात दोहराऊंगा फिर से
तुम हर बात में बिलकुल सही थीं
मैं कुछ भी लिखूं मगर
तुम्हारी कुछ भी गलती नहीं थी

एक महान इंसान

Morning Experience

आज सुबह सुबह एक महान इंसान से बात करने का मौका मिला, नाम से अगर गूगल पर सर्च करेंगे तो शायद ही मिल पाएं मगर उनकी बातें सुन कर जरूर लगा कि बहुत महान हैं। और उन महान इंसान ने मुझ जैसे तुच्छ इंसान के आगे अपनी महानता का बखान केवल इसलिए किया ताकि मुझे ये अहसास हो सके कि वो मुझसे बात कर के कितना बड़ा अहसान कर रहे हैं मुझ पर।

अच्छा तो बात को जरा लम्बा ना खींचते हुए सीधा सीधा वो सब कहता हूँ जो वो कहना चाहते थे अपने दिल में:-
” तुम्हे जरा भी अंदाजा है कि तुम किससे बात कर रहे हो, तुम शायद मुझे नहीं जानते इसीलिए मेरी आलोचना कर रहे हो, अरे तुम्हे क्या पता है, मैंने बचपन से लेकर आज तक हज़ारों किताबें पढ़ी हैं वो भी ऐसे ऐसे लेखकों की जिनके नाम तक तुमको नहीं पता होंगे, हज़ारों किलोमीटर का सफर किया है, इस दुनिया के जितने भी बड़े बड़े समझदार लोग है और बुद्धिजीवी हैं वो सब मेरी जान पहचान के हैं, मैंने खूब समाजसेवा के काम किये हैं, मेरे पास बहुत पैसा है मैं चाहता तो ऐशो आराम की जिंदगी बिता सकता था मगर मैं घूमता रहा और गरीबो के बीच में जा जाकर फोटो खिंचवाता रहा, आप मेरी आईडी देखोगे तो उसका सबूत मिल जायेगा, ये मेरा बड्डपन ही तो है जो मैं तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में शामिल हूँ, और क्या बात करते हो यार कि नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल देश का भला करेंगे, देश का भला सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस कर सकती है और आज तक करती भी आई है, तभी तो याद करो एक वो वक्त था जब तुम घर के बाहर नाली में निपटने जाते थे और आज खुद के घर में संडास में बैठे बैठे फेसबुक चला रहे हो, अगर कांग्रेस ना होती तो तुम्हारा बिलकुल भी भला नहीं होता, हां हां जानता हूँ कि लहर चल रही है, मगर ये सब लोग मूर्ख हैं, आने वाले वक्त में इन्हे इनकी गलती का अहसास होगा और पता चलेगा कि मैं कितना महान हूँ, खैर तुमने किया ही क्या है, अपनी जिंदगी ख़राब ही तो की है अभी तक, ना मेरी तरह हज़ारों किताबें पढ़ी ना कोई समाजसेवा का काम किया, अगर किया है तो डालो उसकी फोटो फेसबुक पर, आखिर मुझे भी तो पता चले। ” और देखो मैं कितना विनम्र हूँ जो इतना महान होकर भी तुमसे बात कर रहा हूँ।

तारीफ के लायक

Determined

मन बहुत भारी हो रहा है, वैसे किसी को लग सकता है कि रात के 1 बजे मन भारी हो रहा है तो जरूर कोई प्यार व्यार का चक्कर होगा मगर ऐसा कुछ नहीं, नींद तो आ रही है मगर सो गया तो मन की बात मन में ही रह जाएगी, लिखने के सिवा कोई और रास्ता भी नहीं खुद का दिल हल्का करने का। बस ऐसा लग रहा है जैसे कुछ किया ही नहीं जिंदगी में अभी तक, कुछ भी ऐसा जिस पर गर्व कर सकूँ, हां वैसे लिखते लिखते याद आया कि कुछ किया तो है जिससे दिल को थोड़ा सुकून मिल रहा है मगर पूरी जिंदगी के लिए उतना काफी नहीं, और ना ही ऐसा जिसे बता कर उसे करने की ख़ुशी को ख़त्म कर दूँ, बस ऐसा कुछ करना है जिससे दिल को भी ख़ुशी मिले और लोग भी प्रेरित हों। कोई ऐसा काम जिसकी लोग तारीफ करें तो लगे जैसे सच्ची तारीफ है, आज किसी दोस्त ने मजाक में कहा कि मैं तारीफ के लायक नहीं, मगर सच कहूँ तो इस एक बात ने पूरी जिंदगी को एक पल में आँखों के सामने लेकर खड़ा कर दिया, सच ही तो कहा उसने कि मैंने ऐसा क्या किया है जिसकी तारीफ की जा सके, बस कुछ एक परीक्षाएं पास की है जो कोई भी पढ़ कर पास कर सकता है, शक्ल सूरत मैंने नहीं बनाई तो उसकी तारीफ मेरी तारीफ नहीं हुई, फिर क्या किया, कुछ भी तो नहीं जिसकी तारीफ की जा सके। बड़ा गर्व करता हूँ खुद ही खुद को लेखक कह कर, मगर क्या इस कलम ने किसी का भला किया है अभी तक, नहीं ना, की है तो सदा खुद की तारीफ या दूसरों की बुराई या अधिक से अधिक समाज में जो फैली बुराई है उसे दिखने की कोशिश की है कभी कभार, मगर इतना काफी नहीं, ऐसा नहीं की तारीफ की जा सके।

अभी तक बस साधन की तलाश में लगा हूँ, ताकि जो साध्य हैं उन्हें साध सकूँ, मगर इतनी देर हो रही है कि सब्र नहीं किया जा रहा, हिम्मत धीरे धीरे छूट रही है, बस उम्मीद के दम पर कोशिशों में लगा हूँ, लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट हैं बस रास्ता ही है जो बार बार अलग अलग मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर देता है। इतना यकीं है कि एक दिन वो जरूर आएगा जब अपने लक्ष्य पूरे कर पाउँगा और वो सब कुछ हासिल कर पाउँगा जो सिर्फ अभी तक मन में है, सोचा बहुत बड़ा है और इसीलिए साधन जुटाने में वक्त लग रहा है और वो भी तब जब परिस्थितियां कई बार प्रतिकूल हो जाती हैं। ना तो लेखक बनना लक्ष्य है और ना ही नाम कामना, लक्ष्य तभी बताऊंगा जब उसे हासिल करने की तरफ थोड़ा और आगे बढ़ जाऊंगा।

आज खुद के साथ उस दोस्त को भी दिल से कहना चाहूंगा कि तुम्हारा बहुत शुक्रिया और हां मैं तुम्हे यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हे एक दिन मेरी तारीफ करने लायक जरूर कुछ कर के दिखाऊंगा और शायद तुम्हे ये गर्व करने का मौका भी दे सकूँ कि मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।