Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

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किस्मत की अहमियत

कई लोगों से सुनता हूँ कि किस्मत साथ नहीं दे रही या फिर किस्मत ख़राब है, पर मेरा ये मानना है कि जब इंसान को अपनी गलतियां थोपने के लिए कोई ना मिला तो उसने किस्मत का आविष्कार किया।
वास्तव में मेरा किस्मत के बारे में ये मानना है कि किस्मत की अहमियत उतनी नहीं है जितनी की अक्सर हम माना करते हैं। किस्मत का महत्व अगर किसी के लिए है तो वो है एक कर्महीन मनुष्य।
क्युंकी गीता में जब श्री कृष्ण ने ये स्पष्ट कहा है कि हमें अपने कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है तो इसका मतलब तो यही हुआ कि अपनी किस्मत के निर्माता हम खुद हैं और जिस चीज़ के निर्माता हम खुद हैं उसे अच्छा या बुरा कहना तो खुद को ही अच्छा या बुरा कहना हुआ।
जब हम अच्छे कर्म करते हैं तो हमें अच्छा फल मिलता है और हम उसे अच्छी किस्मत का नाम दे देते हैं और ठीक ऐसा ही बुरे कर्म करने पर भी होता है।
यदि किसी चीज़ का परिणाम हमारी आशा के अनुरूप नहीं है तो इसका मतलब यही है कि हमारे प्रयासों में कही न कही कोई कमी रह गई है ना की हमारी किस्मत ख़राब है।
हाँ, किस्मत का महत्व तभी है जब हम कोई कर्म नहीं करते या कर्म तो करते हैं पर इंतज़ार नहीं करते। जब कर्म नहीं करते और उसका फल हमें अच्छा मिल जाये  तो शायद हर कोई यही सोचेगा कि किस्मत अच्छी है पर मेरे ख्याल से वह भी हमारे पहले किये हुए किसी अच्छे कर्म का ही नतीजा है जो हमें अब मिल रहा है।
और या फिर हम कर्म तो करते हैं पर फल की अपेक्षा बहुत जल्दी कर लेते हैं। जब हमें फल नहीं मिलता तो सोचते हैं किस्मत ख़राब है और क्या पता उसका नतीजा हमें तब मिले जब वाकई में हमें उसकी जरुरत हो या फिर बाद में सूद समेत और भी बेहतर होकर मिले और तब हम सोचे कि हमारी किस्मत कितनी अच्छी है क्युंकी तब तक हम अपने कर्म को भूल चुके हों। 
निष्कर्ष रूप में कहूँ तो हम अपने ही कर्म के आधार पर कभी किस्मत को अच्छा तो कभी बुरा बनाते है पर उसकी तह में जाएँ तो उसकी वजह हम ही हैं।
एक बात और, ईश्वर का महत्व इसलिए भी है क्यूंकि उसे पता है कि हमें किस चीज़ की जरुरत कब है और वो उसी अनुसार हमारे कर्मों के परिणाम निर्धारित करता है।
विचार व्यक्त करना मेरा अधिकार है और उससे मानना या ना मानना आपकी स्वतंत्रता।
हमेशा की तरह आपके प्रत्युतर की प्रतीक्षा रहेगी ताकि अपने विचारों में स्पष्टता ला सकूँ।
जय हिन्द। जय भारत।

अंग्रेजीयत

अंग्रेजी बस एक भाषा है पर आज ऐसे लगता है जैसे इसने अपने भाषा होने का रूप छोड़ कर एक मानसिकता का रूप धर लिया है। क्युं हमें ये भाषा इतनी अच्छी लगती है कि हम उनसे भी इसी भाषा में बात करने लगे है जो हमारी राष्ट्रभाषा से अच्छी तरह परिचित है।
इसका मुख्य उद्देश्य बस उन लोगों से बात करना था जो हमारी भाषा नहीं जानते और पुरे विश्व पटल पर हमारे देश को पहचान दिलाना था, पर क्युं हमारे देश में ये अनिवार्यता बन गयी है, हमारे ही भाई बहन आपस में अंग्रेजी में बात करते है, मेरे कई भाई तो हर चीज़ में अंग्रेजो को हमसे आगे बताते है और सीधा उनकी हमसे तुलना करने लग जाते है हर बात में, ऐसा लगता है जैसे मैं उनसे नहीं किसी अंग्रेज से बात कर रहा हूँ जो अपनी श्रेष्ठता की पैरवी कर रहा हो।

और  सबसे मजे की बात तो ये है की अंग्रेजी बोलने को स्टैण्डर्ड का दर्जा दे दिया जाता है। 
अगर हमें विदेश में नौकरी करनी हो या देश में रह कर विदेशियों के साथ काम करना हो या कहीं ऐसी जगह भारत का प्रतिनिधित्व करना हो जहाँ लोग हमारी भाषा से परिचित ना हो या ऐसी जगह पर जहाँ हम इस भाषा को सीख रहें है वहाँ तो इसका इस्तेमाल समझ आता है, अन्य स्थानों पर ये मेरी समझ से परे है।
हमारे ही देश में नौकरी पाने की अनिवार्य शर्त बना दिया जाता है इसे, उस संस्थान के द्वारा जहाँ पर सभी लोग राष्ट्रभाषा से भली भांति वाकिफ है।
क्या हमारे लिए भी घर की मुर्गी दाल बराबर है? 
चलिए बात केवल बोलने तक होती तब तो फिर भी ठीक थी पर इसने तो भाषा से आगे बढ़ कर मानसिकता का रूप ले लिया है। भाषा को सीखा जा सकता है वो भी बिना खुद को बदले मगर मानसिकता को जब जीवन में उतार लिया जाता है तब हम उसके गुलाम हो कर रह जाते है और वो भी अपनी मर्ज़ी से जिसकी कोई स्वंत्रता नहीं।
क्या हमें खुद पर गर्व नहीं, क्यों हम उनके बनाये मानदंडो को ही खुद के अस्तित्व का आकलन करने का पैमाना बना लेते हैं?
आज जितने भी अभिनेता, अभिनेत्रियों, नेताओं को देखता हूँ, उनमे से कुछ एक को छोड़ कर सभी पत्रकारों से अंग्रेजी में बात करते है, जबकि वही लोग परदे पर या फिल्मो में बड़ी अच्छी हिंदी बोलते हैं, तो क्या वो बाहर आते ही हिंदी भूल जाते है या उन्हें शर्म आती है हिंदी में बोलते हुए या फिर वो ऐसे लोगों के लिए बोलते है जिन्हें हिंदी नहीं आती। उनका ये तरीका मेरी तो समझ के परे है और मुझे इसका कोई तर्कसंगत कारण नजर नहीं आता, आपको पता हो तो मुझे बताने का कष्ट करें। 
क्या वे परदे पर मज़बूरी में हिंदी बोलते हैं??
और एक सबसे बड़ी विडंबना देखता हूँ की सिर्फ अंग्रेजी जानने की वजह से कुछ लोग खुद को अन्यों से श्रेष्ठतर समझने लगते हैं।
हमारी संस्कृति में आंतरिक उत्थान पर जोर दिया गया है वहीँ उनकी सभ्यता बाहरी दिखावे के दम पर चलती है, जहाँ आंतरिक मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं।
उम्मीद करता हूँ हम अंग्रेजी को सिर्फ एक भाषा होने तक ही सीमित रख पाएंगे और अपनी संस्कृति, सभ्यता पर गर्व करते हुए इसे अक्षुण बनाए रखने का हर संभव प्रयास करेंगे।
अगर मैं कहीं गलत हूँ या तस्वीर अधूरी रह गई है तो आपके विचार सादर आमंत्रित हैं।
साधुवाद के लिए भी पर्याप्त प्रतीक्षा रहेगी।
जय हिन्द। जय भारत।

objective of this blog

this blog is created to discuss on various issues and topics in order to clear any doubt regarding anything and to emerge with clear cut understanding of your thought.
A healthy discussion in which good listening is involved needs supporting the right thing, objecting the wrong one, providing solution to the problem and remove the dilemma about the topic.

I am not fighting for proving me right, I just believe in gain your support by providing logic in favour of my thought. If something which I think is wrong or inappropriate, I am ready to accept but only when you give genuine reason for your concept.

All the things about social life, India, problems prevailing, ways to improving anything or any topic relating to the human interest will be discussed here.

This is a life long journey, hope you will support me by being my guide in this journey.

Meet you tomorrow with a new topic and my understanding about that. till then Jai Hind, Jai Bharat.

ना जाने कब से शुरुआत करने का सोच रहा था 
मगर जिंदगी के इम्तिहानों ने खुद के लिए वक़्त ना दिया 
आखिर इच्छाओ की प्रबलता ने जीत हासिल कर ही ली 
ला खड़ा किया मुझे नई मंजिल के रास्तों पर 
उम्मीद है वो सब कुछ हासिल होगा जिसका सपना  है