Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

बेहतर है मैं प्यार लिखूं

ऊंच नीच और ज्ञान की बातें 
बाँट देती है लोगों को 
सबको जोड़े रखने को अब 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

कहाँ का नेता, कहाँ का चमचा 
मिले वोट बस वहीँ पे थम जा 
लड़ जा, भिड़ जा, कट जा, पिट जा 
नेताओं के खातिर मिट जा 
मेरा नेता, तेरा नेता 
कौन है बाप और कौन है बेटा 
इन सब बातों में पड़कर अब 
काहे मैं तकरार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

मरे जो कोई मर जाने दो 
लुटे जो कोई लुट जाने दो 
सब चालू है, सब फ़र्ज़ी हैं 
इन सबकी खुद की मर्ज़ी है 
हमने तो कब से साहबों को 
डाल रखी कितनी अर्ज़ी है 
भूख, गरीबी नहीं है कुछ भी 
और ना भ्रष्टाचार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

वो देखो वो मुन्नी, शीला 
किसका कितना दिल है ढीला 
नाचो गाओ कुछ ना सोचो 
नेताओं का सर ना नोचो 
कांड करे सो कांडा भाई 
घास चरे सो लल्लू 
ये सब तो हैं बड़े लोग 
बस हम ही एक निठल्लू 
न्याय के मंदिर में निर्धन की 
अब तो सदा ही हार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

वो है कमतर, वो है बेहतर 
क्या मिलता है ये सब कह कर 
नेतागीरी का लगा है मेला 
सबके साथ है सबका चेला 
देश बेचकर खा लेंगे पर 
हमको नहीं मिलेगा धेला 
लड़ कर भी जब मिले ना कुछ भी 
क्यों मैं हाहाकार लिखूं 
बेहतर है मैं प्यार लिखूं

Posted under: Poetry by Vikas Purohit

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