Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

तन्हाई

पहले तुम थी अब ये तन्हाई है
मगर तन्हाई भी तो तुम्हे ही लाई है
बन गई है मेरी
साँसों की तरह
कुछ रहे न रहे ये रहेगी
आखिरी दम तक
बेशक ज़माने ने छीन लिया है तुम्हे मुझसे
मगर ना छीन सकेगा
इस तन्हाई को
और उसमे बसी हुई तुमको
पहले भी तुम थी,
अभी भी तुम हो
फर्क सिर्फ इतना है कि अब
सिर्फ तुम सुनती हो
कहती कुछ नहीं
कुछ पूछता हूँ तुमसे
तो याद दिला देती हो कोई गुजरी बात
और मुझे मिल जाता है
मेरे हर सवाल का जवाब

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