Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

चुनाव आते ही

मुझे पता है तुम
वही करोगे फिर से
चुनावआते ही
वही वादेफिर से,
वहीघोषणाएं फिर से
मगरनहीं समझोगे कि
दिलतोड़कर जोड़ने से
रहजाती है दरारें
झांकते हैं जिनमे से
जख्म, दर्द, हर वक्त
तन पर कपड़ा डालने से
नहींलौट आती लुटी आबरू
नाही अब खाना देने से
पायेगी लौट कर
उनभूखी रातों की नींद
तुमसमर्थ हो
सबकुछ भूल कर
मुस्कुराने में
मगरहमने तो सहा है सब
कैसे भूलेंगे हर पल
टूटते सपनोको
अपनीमजबूरियों को
भूखसे नीचे दब कर
देशके लिए कुछ ना
करपाने की बेबसी को
मगरतुम नहीं समझोगे ये सब
करोगेढोंग अच्छे बनने का फिर से
औरभी सब कुछ वही फिर से
जोकरते हो हर बार
चुनाव आते ही

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