Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

खून हर किसी का अब उबाल में है

कौन नहीं जानता कि वो किस हाल में हैं
गीदड़ छुपे हुए शेर की खाल में हैं

बहुत उड़ रहे थे परिंदे बन के ख़्वाबों में
नींद से जागे तो जाना पड़े नाल में हैं

चाहे लाख झुठलाने की कोशिश करे मगर
नियत उनकी भी बेईमानी के माल में है

जितना चाहे मुस्कुरा लो पैसों की भीड़ पर
पर इस बार जनता भी तुम्हारी ही चाल में है

तूने तो कोई कसर ना रखी थी मगर
उपरवाले का रहम कब से मेरी ढाल में है

ये तो भला है कि जिन्दा हो तुम अब तक
वरना हम तो कब से मौके के ख्याल में हैं

ये समझ ले कि वक्त पूरा हो चुका है तेरा
कि खून हर किसी का अब उबाल में है

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