Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

कोई कैसे यकीं कर ले

अपनी ऐशगाह में बैठ कर तुम यूँ बरगलाते हो 
खुद की रौशनी के लिए औरों का दिल जलाते हो 

बहुत मुद्दत से तुमने गरीबों की भूख नहीं देखी 
तुम तो सदा अक्ल के अंधों को ही चराते हो 

कोई कैसे यकीं कर ले अब तुम पर हर दफा
खुद ही कहते हो और खुद ही मुकर जाते हो

शक्ल तुम्हारी कुछ जानी पहचानी सी लगती है
हां तुम ही तो हर पांच साल में लौट कर आते हो

अगर कहते हो खुद को सेवक तो जरा बताओ
अपने घर पर हमेशा ही ये ताले क्यूँ लटकाते हो

सिर्फ जिन्दा लोगों को लूट लेते तो फिर भी ठीक था
तुम तो सुकून भरी लाशों के भी आशियाने चुराते हो

बहुत ढूंढा मगर नहीं मिला तुम्हारा ठिकाना
बस इतना बता दो तुम खाना कहाँ खाते हो

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