Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

एक माँ ही

बहुत कुछ लिखने को

लिखा जाता है माँ पर

कोई तो लिखे पिता पर भी

प्यार जिनका अक्सर

रह जाता है अनकहा

करना पड़ता है बस महसूस

अपनी ख़ुशी में देखनी होती है

उनकी आँखों की चमक

अपनी बेबसी में उनकी व्यथित आँखें

बिना जताये सब कुछ करने की आदत

माँ का आदर करने पर

उसी तरह खुश होते हैं पिता

अपनी सारी तकलीफें,

एक मुस्कान में भूलने की

वो मासूमियत

क्या लिखूं कि वो देखते हैं

मुझे हर पल

अनजान बने रह कर भी

पूछते हैं मेरा दुःख

अकेले में माँ से

समझते हैं चेहरे का हर भाव

बिलकुल माँ की तरह

लगता है जैसे माँ से भी ज्यादा

नाज़ुक है इनका दिल

आखिर पिता भी तो

होते हैं एक माँ ही”

Posted under: Poetry by Vikas Purohit

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