Vikas Purohit "Poorve"

A New Age Writer and Poet

मनहूसियत के परे

मुझे मनहूस लोगों से सख्त चिढ़ होती है, अब आप कहेंगे कि मनहूस भला कोई कैसा होता है? मनहूस वो होता है जो खुद तो दुखी रहता ही है साथ ही अपने आस पास और खुद से जुड़े लोगों को

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नागपंचमी

इनकी मृत आत्माओं को आओ फिर से जिलाएँ हम आज नागपंचमी है यारों इनको दूध पिलाएँ हम तोप, कोयला या मिट्टी हो, सब कुछ पच जाता इनको भर जाये इनका मन आखिर, ऐसा क्या खिलाएं हम। डरते नहीं ये ईश्वर

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ईमानदारी का दूसरा पहलू

राज्य में नई नई ईमानदार सरकार आई है, हर कोई खुश है कि चलो अब तो भ्रष्टाचार ख़त्म होगा, अब कोई भी रिश्वत नहीं लेगा, अब हमारा काम सरकारी व्यवस्था द्वारा पूरी ईमानदारी से किया जायेगा| खैर ये तो लोगों

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इस अधूरी सी चाह पर

सब जानते, समझते हुए भी इन आँखों ने बरसते हुए भी खुद को पत्थर का कर के एक शीशे सा खुद को बिखरते देखा है अक्सर तुझको बेबस सा पाकर खुद को हर बार तेरे आंसू तुझसे ज्यादा मुझे रुलाते

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एक माँ ही

बहुत कुछ लिखने को लिखा जाता है माँ पर कोई तो लिखे पिता पर भी प्यार जिनका अक्सर रह जाता है अनकहा करना पड़ता है बस महसूस अपनी ख़ुशी में देखनी होती है उनकी आँखों की चमक अपनी बेबसी में

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बेहतर है मैं प्यार लिखूं

ऊंच नीच और ज्ञान की बातें  बाँट देती है लोगों को  सबको जोड़े रखने को अब  बेहतर है मैं प्यार लिखूं कहाँ का नेता, कहाँ का चमचा  मिले वोट बस वहीँ पे थम जा  लड़ जा, भिड़ जा, कट जा,

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मानव कैसे कहूँ तुझे

पशु कहूँ, हैवां कहूँ या कोई लाऊं शब्द नवीन मानव कैसे कहूँ तुझे, जब मानवता रही नहीं क्रूर कहूँ, जालिम कहूं, दुष्कर्मी, हृदयहीन खून तेरा पानी हुआ, जो तू पिघला ही नहीं   एक पल भी ना सोचा तूने, तू भी

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तुम्हारी गलती नहीं थी

क्यूँ देखते हो हर बात में सिर्फ अपना अक्स वो दौर बीत चुका है जब तुम ही दुनिया थे हर बात शुरू होती थी सिर्फ तुमसे और सारी कोशिशें भी थी तुम्हे पाने की उम्मीद से ही हां ये सही है कि कोई गलती नहीं है तुम्हारी मगर ये भी

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एक महान इंसान

आज सुबह सुबह एक महान इंसान से बात करने का मौका मिला, नाम से अगर गूगल पर सर्च करेंगे तो शायद ही मिल पाएं मगर उनकी बातें सुन कर जरूर लगा कि बहुत महान हैं। और उन महान इंसान ने

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तारीफ के लायक

मन बहुत भारी हो रहा है, वैसे किसी को लग सकता है कि रात के 1 बजे मन भारी हो रहा है तो जरूर कोई प्यार व्यार का चक्कर होगा मगर ऐसा कुछ नहीं, नींद तो आ रही है मगर

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मीडिया: वकील या जज?

हाँ ये सही है कि मीडिया का काम जनता की नब्ज को पहचानते हुए उनसे जुडी खबरें दिखाना है, मगर यदि कोई उंगली उठाता है मीडिया पर तो इसे सभी स्वीकार करेंगे कि मीडिया को भी आत्ममंथन की जरुरत है, कहीं न कहीं मीडिया अब तथ्य रखने के बजाय फैसले सुनाने लगा है, जनता का वकील होने की

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उम्मीदें एक बिंदु

जब  उम्मीदें एक बिंदु पर आकर टिक जाती हैं तो ऐसा ही होता है कि निराशा हाथ लगती है, अक्सर ऐसा होता है कि जिस एक चीज़ पर हम निर्भर हो जाएँ वही हमसे छूट जाती है। हम सोचते हैं

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